कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने गुरुवार को इजराइल-फिलिस्तीन युद्ध को लेकर मोदी सरकार की विदेश नीति की आलोचना की। उन्होंने कहा कि फिलिस्तीन मुद्दे को हल करने के लिए भारत को नेतृत्व करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष पर भारत का रुख बहुत निराशाजनक रहा है। सरकार की गहरी चुप्पी मानवता और नैतिकता के साथ विश्वासघात है। यह भारत की पुरानी विदेश नीति से भी अलग है।
गांधी ने आरोप लगाया कि इस मुद्दे पर भारत का रुख पीएम नरेंद्र मोदी और इजराइल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू की निजी दोस्ती से प्रभावित दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि विदेश नीति व्यक्तिगत रिश्तों से तय नहीं होनी चाहिए।
गांधी ने बताया कि फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा, पुर्तगाल और ऑस्ट्रेलिया समेत दुनिया के 193 में से 150 से ज्यादा देश फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता दे रहे हैं।
यह कदम उन फिलिस्तीनी लोगों की सपनों और उम्मीदों को मान्यता देने की ऐतिहासिक शुरुआत है, जो लंबे समय से पीड़ा झेल रहे हैं।
दुनिया जब फिलिस्तीन को समर्थन दे रही है, तब भारत ने हाल ही में इजराइल के साथ निवेश समझौता किया और उसके दक्षिणपंथी मंत्री की मेजबानी भी की, जिसकी आलोचना पूरी दुनिया में हो रही है।
गांधी ने अफसोस जताया कि पहले जो भारत मानवाधिकार और न्याय की आवाज बुलंद करता था, आज वही भारत इस मुद्दे पर चुप है। उन्होंने कहा कि फिलिस्तीन का मामला भारत के लिए सिर्फ विदेश नीति नहीं, बल्कि नैतिक और सभ्यता से जुड़ी जिम्मेदारी भी है।
गांधी ने गाजा की वर्तमान स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अक्टूबर 2023 से शुरू हुई हिंसा में अब तक 55 हजार से ज्यादा फिलिस्तीनी नागरिक मारे गए हैं, जिनमें 17 हजार बच्चे भी शामिल हैं।
गाजा का स्कूल, अस्पताल, घर और उद्योग खत्म हो गए हैं। लोग अकाल जैसी स्थिति में जी रहे हैं। इजराइली सेना भोजन, दवा और जरूरी मदद पहुंचने से रोक रही है। जब नागरिक भोजन लेने जाते हैं, तब उन पर गोलियां चलाई जाती हैं। यह अमानवीयता की हद है।

