वसुधैव कुटुम्बकम की सोच ने भारत को विश्व गुरू बनाया: श्री हरि चैतन्य महाराज

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Faridabad/Atulya Loktantra : प्रेमावतार युगदृष्टा श्री हरि कृपा पीठाधीश्वर एवं भारत के महान सुप्रसिद्ध युवा संत श्री श्री 1008 स्वामी श्री हरि चैतन्य पुरी जी महाराज ने भारतीय संस्कृति व मां जगदम्बे की महिमा पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति विश्व की वह पुरातन संस्कृति है, हमारी सोच हमेशा से वसुधैव कुटुम्बकम की रही है तथा इसी सोच ने भारत को विश्व गुरू की पदवी पर पहुंचाया तथा मां जगदम्बा के आशीर्वाद से उनके भक्त तो क्या असुर भी भवसागर से तर जाते है। श्री हरि चैतन्य पुरी एन.एच.दो स्थित भगत वासुराम लखानी चैरिटेबल ट्रस्ट धर्मशाला में पुुरी टायर एण्ड टयूब्स द्वारा आयोजित माता की चौकी कार्यक्रम में उपस्थित भक्त जनों को सम्बोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में पहुंचने पर उनका कमलपुरी, प्रवीणपुरी, विमलपुरी, पलकपुरी, गौरवपुरी, प्रतीकपुरी, प्रिया पुरी, तुश्सार मनोचा, गरिमापुरी, सन्नी महाजन आदि ने पुष्प मालाओं से भावपूर्ण स्वागत किया।

उपस्थित भक्तों को संबोधित करते हुए चैतन्य पुरी जी महाराज ने कहा कि देवी जगत की उत्पत्ति के समय ब्रह्मसूत्र और जगत की स्थिति में हरि रूप धारण कर लेती है। तथा संहार के समय रूद्र मूर्ति बन जाती है। वह देव और मानव जाति के रक्षार्थ युद्ध करते हुए शत्रुओं का संहार करती है। उन्होंने कहा कि महामोह तथा मिथ्या अहंकार रुपी महिषासुर तथा राग.द्वेष आदि मधु.कैटभ को मारने के लिए गुरु उपदेश, सत्संग, राम.कथा व प्रभु वाणी आदि (ये सब एक ही है) कराल कालिका है। काली हाथ में खडग लेकर महिषासुर (वह असुर जो भैसे का रूप धारण कर आया था) भैंसे का नही अपितु भैसे के रूप में आए असुर का वध करती है। आज अनेक स्थानों पर इसी के प्रतीक रूप में भैसों की या अन्य जीवो की बलि का अमानवीय व निंदनीय कृत्य महा अपराध है तथा वेद, शास्त्र, संत, गुरु, प्रभु ज्ञानरूपी खडग़ लेकर हमारे अंतर के राक्षसत्व, पांच चोर, महामोह व मिथ्या अहंकार रुपी महिषासुर का वध करते हैं।

उन्होंने कहा कि इस संसार में कर्मएविकर्मए अकर्म को समझना बड़ा ही कठिन है। इनको या तो भगवान जानते हैं या तो भगवद तत्व का अनुभव करने वाले महात्मा लोग जानते हैं। अपने मन से कल्पना कर बैठना की यह पाप हैए यह पुण्य है, यह अज्ञानता का लक्षण है। परमात्मा के सिवाय ऐसा कौन है जिसको पाप और पुण्य का साक्षात्कार हुआ हो, इसी कारण भगवान खरा खोटा नहीं देखते हैं जो उनकी शरण में आ जाए उसे स्वीकार कर लेते हैं। सुख.दुख, हानि.लाभ, यश.अपयश, जीवन. मृत्यु, अनुकूल.प्रतिकूल सभी में परमात्मा की कृपा का सदैव अनुभव करते हुए प्रभु स्मरण व अपने अपने कर्तव्यों का पालन करते रहने में ही कल्याण है। उन्होंने कहा कि अन्तरदृष्टि (दिव्य नेत्र) खुलने पर परमात्मा या आत्मा का स्वरूप दिखाई देगा। बाह्य चर्म नेत्रों से बाह्य चर्म इत्यादि ही दिखता है। वह दिव्य दृष्टि या तो प्रभु कृपा कर के दे देए जैसे अर्जुन द्वारा विराट रूप देखने की इच्छा जाहिर करने पर प्रभु कहते हैं कि इन नेत्रों से तू मेरे उस स्वरूप को नहीं देख सकता इनसे तो सभी देख रहे हैं किसने पहचाना तुझे दिव्य नेत्र प्रदान करता हूं उनसे तू मुझे देख। या गुरु कृपा से प्राप्त हो सकते हैं जैसे व्यास जी संजय को प्रदान करते हैं या ऐसा भक्त या संत दे सकता है, जैसे वाह्य नेत्र ना होने के बावजूद धृतराष्ट्र को संजय ने सारा वृतान्त बता दिया व दिखा दिया।

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