जाटों की नाराजगी नहीं भाजपा के नेताओं की मनमानी से नहीं मिला बहुमत

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Haryana/Alive News : हरियाणा विधानसभा चुनाव में भाजपा का अल्पमत में आना किसी के गले नहीं उतर रहा। जिस पार्टी ने चुनाव से पहले ‘अबकी बार 75 पार’ का नारा दिया हो और नतीजे आने के बाद वही पार्टी 40 सीटों पर सिमट जाए, तो सिर चकराना जायज है। मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों ने इसके लिए कई कारणों को जिम्मेदार ठहराया।

किसी ने कहा, जाट भाजपा से नाराज थे। प्रदेश में अनुच्छेद 370 का कोई असर नहीं हुआ। ऐसा नहीं था। लेकिन भाजपा के ही भीतर से जो बातें निकल कर आ रही हैं, उनसे पता चला है कि हरियाणा में जाट, मोदी से नाराज नहीं थे। अनुच्छेद 370 हटाने का भी यहां के लोगों ने दिल खोलकर स्वागत किया था।

दरअसल, भाजपा के खराब प्रदर्शन के दो कारण माने जा रहे हैं। पहला, प्रदेश के भाजपा नेता मोदी की भावनात्मक आंधी में बह गए। उन्हें लगा कि टिकट जिस किसी को दे दो, वह लोकसभा चुनाव की भांति मोदी की आंधी में पार हो जाएगा। दूसरा, भाजपा नेताओं की आपसी कटुता इतनी ज्यादा रही कि उन्हें खुद इसका अहसास तब हुआ जब चुनाव परिणाम में पार्टी का ग्राफ 40 सीटों पर आकर ठहर गया।

यह हार भाजपा नेताओं की महत्वाकांक्षा और उनके कुप्रबंधन का नतीजा थी…
हरियाणा में भाजपा की कमजोर जीत के लिए अधिकांश मीडिया और राजनीतिक विश्लेषक एक ही मुद्दे पर अटक कर रह गए हैं। वे सोचते हैं कि हरियाणा की हार जाटों की नाराजगी के कारण हुई। अगर गहराई में जाकर विश्लेषण करें तो यह हार जाटों की मोदी के खिलाफ नाराजगी न होकर, हरियाणा में चुनाव की बागडोर संभाल रहे भाजपा नेताओ की महत्वाकांक्षा और उनके कुप्रबंधन का नतीजा थी।

ऐसे ही कुछ संकेत भाजपा के एक राष्ट्रीय महामंत्री ने अमर उजाला से बातचीत में दिए हैं। उनकी दलील थी कि यदि हम हरियाणा विधानसभा के नतीजों को भाजपा के प्रति जाटों की नाराजगी मानें तो यह पूर्णतया गलत होगा। वजह, यदि ऐसा होता तो 2019 के लोकसभा चुनावों में लगभग 72 विधानसभा सीटों पर भाजपा ने बढ़त बनाते हुए प्रदेश की सभी दस लोकसभा सीटों पर जीत न दर्ज कराई होती।

खास बात है कि 2019 के लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव के बीच पीएम मोदी ने ऐसा कोई निर्णय नही लिया, जिस कारण जाट समुदाय भाजपा से नाराज होता। मोदी सरकार ने कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का जब निर्णय लिया तो उससे सबसे अधिक खुश होने वाले जाट ही थे। इसे भले ही राजनीतिक विवश्ता कहें, लेकिन कांग्रेस नेता और दस साल तक प्रदेश के सीएम रहे भूपेंद्र हुड्डा ने बागी होकर अनुच्छेद 370 हटाने के मोदी सरकार के निर्णय का स्वागत किया था। उनका यह कदम कांग्रेस पार्टी के रुख के विपरीत था।

अब विधानसभा चुनाव में ऐसा कोई नकारात्मक प्रचार भी नहीं किया गया। चुनाव में कोई जात-पात को लेकर ज्यादा बात नहीं हुई। जब ऐसा कुछ नहीं था तो फिर भाजपा 40 पर आकर क्यों ठहर गई। इस भाजपा नेता के मुताबिक इसका जवाब भाजपा के भीतर ही है और इन नतीजों के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व नहीं बल्कि चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी जिन्हें दी गई थी, वह जिम्मेदार हैं। इस नेता के मुताबिक राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को अपने सूत्रों और संघ सूत्रों से एसी ही जानकारी मिल रही है।

भाजपा रणनीतिकारों का अति आत्मविश्वास कि मोदी मैजिक विधानसभा चुनाव में भी चलेगा, कोई चिंता नहीं
मोदी सरकार ने जब अनुच्छेद 370 हटाया तो उसके कारण देश भर में भावनात्मक आंधी चली।भाजपा को कहीं न कहीं इसका राजनीतिक फायदा भी नजर आया, लेकिन खासतौर पर हरियाणा के भाजपा नेता इस भावनात्मक आंधी के चक्कर में आ गए।उनके दिमाग में बैठ गया कि मोदी मैजिक चल रहा है।लोकसभा की तरह विधानसभा में भी 75 पार हो जाएंगे।इसी भावनात्मक आंधी ने भाजपा का टिकट प्राप्त करने वालों की एक लंबी कतार खड़ी कर दी।दूसरी पार्टियों के नेताओं में भाजपा ज्वाइन करने की होड़ मच गई।जब ऐसे नेताओं ने टिकट के लिए संघ के पदाधिकारियों और भाजपा नेताओं के चक्कर काटने शुरु किए तो उनका उत्साह अति उत्साह में तबदील हो गया।वे इस मुगालते में रहने लगे कि जिसे भी टिकट देंगे, वह जीत जाएगा।
इस भावनात्मक आंधी को कुछ नेताओं ने धन अर्जन एवं सत्ता प्राप्ति का मौका समझ लिया

प्रदेश के भाजपा नेता मोदी मैजिक की भावनात्मक आंधी में उड़ रहे थे।कई नेताओ ने इस मौके को धन अर्जन एवं सत्ता प्राप्ति का एक सर्वोत्तम मौका समझ कर दांव लगा दिया।कुछ अति महत्वाकांक्षी नेताओ ने अपने मकसद की प्राप्ति के लिए उत्तरप्रदेश के एक मंत्री चौधरी भूपेंद्र सिंह को हरियाणा का सह प्रभारी बनवाने की जुगत लगाई।वे उसमें सफल भी रहे।इन नेताओं का मकसद था कि किसी भी तरह कैप्टन अभिमन्यु को मुख्यमंत्री बनवाया जाए।जानकारों का कहना है कि ऐसे नेताओं ने अपनी यह कहानी आगे बढ़ा दी।उनकी सोच थी कि कोई दूसरा मजबूत जाट नेता मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री पद का दावा न कर सके इस चक्कर में मजबूत जाट नेताओं के टिकट कटवा दिए गए।उनके बदले कम प्रभावशाली लोगों को टिकट थमा दिया गया।यह सब इसलिए किया गया ताकि अभिमन्यु का मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री बनने का दावा पक्का हो सके।

भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने प्रदेश नेताओं के बीच संतुलन बनाए रखने और मनमानी रोकने के लिए केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को हरियाणा का प्रभारी बनाया, किन्तु उसी वक्त उनकी माता जी का देहांत हो गया।धार्मिक अनुष्ठान की मजबूरी वश वे लोगो से मिलने पहुंचे।

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