‘एक देश-एक चुनाव’ की चर्चा के बीच केंद्र सरकार ने ‘एक देश-एक वोटर लिस्ट’ लागू करने की तैयारी भी शुरू की है। उसे अब रामनाथ कोविंद कमेटी की रिपोर्ट का इंतजार है। ‘एक देश-एक चुनाव’ पर विचार और सुझाव के लिए बनी कोविंद कमेटी को सिंगल वोटर लिस्ट लागू करने के तरीकों पर भी सुझाव देने हैं।
सरकार ने तीनों स्तर (लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय) के चुनाव के लिए एक ही मतदाता सूची का रोडमैप तैयार किया है। इसमें सभी राज्यों को सहमत करने की योजना है। इसके लिए न सिर्फ निर्वाचन आयोग के मतदाता सूची तैयार करने के तरीके में बदलाव होगा, बल्कि राज्यों के चुनाव संबंधी कानून में भी परिवर्तन की जरूरत होगी।
लॉ कमीशन और चुनाव आयोग ने की थी सिफारिश
लॉ कमीशन और चुनाव आयोग काफी पहले से ‘एक देश-एक वोटर लिस्ट’ की सिफारिश कर चुके हैं। अगस्त में संसदीय समिति ने सरकार को राज्यों व पार्टियों से परामर्श कर संवैधानिक प्रावधानों व राज्यों के अधिकारों काे ध्यान रखते हुए इसे लागू करने की योजना बनाने को कहा था।
मौजूदा स्थिति में संविधान के अनुच्छेद 325 के तहत देश में एक मतदाता सूची लागू करना केंद्र सरकार के दायरे से बाहर है। अभी लोकसभा, विधानसभा, स्थानीय निकाय के लिए अलग सूची होती है।
अभी क्या व्यवस्था है?
लोकसभा-विधानसभा चुनाव भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के जिम्मे है। जबकि नगर निगम, नगर पालिका परिषद व ग्राम पंचायत जैसे स्थानीय निकाय चुनाव राज्य चुनाव आयोग के दायरे में आते हैं। दोनों निर्वाचन एजेंसियों को संविधान ने अपनी मतदाता सूची बनाने का अधिकार दिया है।
ECI के पोलिंग स्टेशन की सीमाएं स्थानीय निकाय के वार्ड और पंचायतों की सीमाओं से मेल खाएं, यह जरूरी नहीं है। राज्य आयोग आमतौर पर ECI की मतदाता सूची को ड्राफ्ट की तरह इस्तेमाल करते हैं। वे उसमें अपने वार्ड चिह्नित करते हैं और अपना डेटा शामिल करके दावे-आपत्तियां बुलाते हैं। फिर अंतिम सूची जारी होती है।
नया प्रस्ताव क्या है?
जिस तरह संसदीय सीट के दायरे की विधानसभा सीटों की सीमाएं उसी लोकसभा सीट की सीमा के दायरे में रहती हैं, ठीक उसी तरह वार्ड व पंचायतों की सीमाएं भी विधानसभा सीट के दायरे में ही रखी जाएं। इसके लिए राज्यों का चुनाव कानून बदलना होगा।


