केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि अगर राज्यपाल विधेयकों पर कोई फैसला नहीं लेते हैं तो राज्यों को कोर्ट की बजाय बातचीत से हल निकालना चाहिए।
केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सभी समस्याओं का समाधान अदालतें नहीं हो सकतीं। लोकतंत्र में संवाद को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हमारे यहां दशकों से यही प्रथा रही है।
CJI बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने गुरुवार को लगातार तीसरे दिन भारत के राज्यपाल और राष्ट्रपति की तरफ से बिल को मंजूरी, रोक या रिजर्वेशन मामले की सुनवाई की। बेंच में CJI के अलावा जस्टिस सूर्यकांत, विक्रम नाथ, पी एस नरसिम्हा और ए एस चंदुरकर शामिल हैं।
मेहता ने आगे कहा कि मान लीजिए कि राज्यपाल विधेयकों पर विचार नहीं कर रहे हैं, तो राजनीतिक समाधान हैं जिन्हें अपनाया जा सकता है। ऐसा हर जगह नहीं होता कि मुख्यमंत्री अदालत की ओर दौड़ पड़ते हैं।
ऐसे कई उदाहरण हैं जहां बातचीत होती है, मुख्यमंत्री राज्यपाल से मिलते हैं, वे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से मिलते हैं और समाधान निकल आता है। कई बार फोन पर बातचीत से हल निकाला गया।
तुषार मेहता ने आगे कहा कि दशकों से, विवादों को सुलझाने के लिए यही प्रथा अपनाई जाती रही है। प्रतिनिधिमंडल राज्यपाल और राष्ट्रपति से मिलते हैं और कभी-कभी बीच का रास्ता निकल आता है।
मेहता ने आगे तर्क दिया कि संविधान में कहीं भी राज्यपाल या राष्ट्रपति के लिए विधेयकों पर कार्रवाई करने की कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है और जहां समय-सीमा दी गई है, वहां स्पष्ट रूप से इसका उल्लेख किया गया है।
अदालत संसद से विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर राज्यपाल के लिए समय-सीमा तय करने वाला कानून बनाने का अनुरोध कर सकती है, लेकिन इस अदालत के फैसले के जरिए ऐसा नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि निर्वाचित सरकारें राज्यपालों की मर्जी पर नहीं चल सकतीं। अगर कोई बिल राज्य की विधानसभा से पास होकर दूसरी बार राज्यपाल के पास आता है, तो राज्यपाल उसे राष्ट्रपति के पास नहीं भेज सकते।
संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास चार विकल्प होते हैं- बिल को मंजूरी देना, मंजूरी रोकना, राष्ट्रपति के पास भेजना या विधानसभा को पुनर्विचार के लिए लौटाना। लेकिन अगर विधानसभा दोबारा वही बिल पास करके भेजती है, तो राज्यपाल को उसे मंजूरी देनी होगी।
CJI बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने कहा कि अगर राज्यपाल बिना पुनर्विचार के ही मंजूरी रोकते हैं, तो इससे चुनी हुई सरकारें राज्यपाल की मर्जी पर निर्भर हो जाएंगी। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को यह अधिकार नहीं है कि वे अनिश्चितकाल तक मंजूरी रोककर रखें।
बेंच में CJI के अलावा जस्टिस सूर्यकांत, विक्रम नाथ, पी एस नरसिम्हा और ए एस चंदुरकर शामिल हैं। पांच जजों वाली बेंच गुरुवार को लगातार तीसरे दिन ‘भारत के राज्यपाल और राष्ट्रपति की तरफ से बिल को मंजूरी, रोक या रिजर्वेशन’ मामले की सुनवाई जारी रखेगी।


