•माता गुजरी जी को राष्ट्र माता की उपाधि से सम्मानित किया जाये
बिलासपुर ( हिमांचल प्रदेश)/ अतुल्य लोकतंत्र – महेंद्र सिंह ( प्रदेशाध्यक्ष ,अखिल भारतीय गुर्जर महासभा ,हिमाचल प्रदेश ) ने कहा है कि जिस तरह मातृभूमि की रक्षा के लिये पति हिन्द दी चादर गुरु तेग बहादुर जी ने शहीदी दी ,चार पोतों की शहीदी ,छोटे साहिबजादो ने दीवारों में खड़े होकर हिन्द की रक्षा के लिये सिर दिये तब मुगल यहाँ से भागे थे । बेटे गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ सजाया तभी मुगल जड़ों से मिटाये नहीं तो भारत देश की दशा कुछ और ही होती ।माता गुजरी जी जिन्होंने सिख इतिहास में केंद्रीय भूमिका निभाई थी।पूरे परिवार की शहीदी के बाद भी माता गुजरी जी ने धर्म नहीं बदला था ।गुरु तेग बहादुर जी की शहीदी के बाद माता गुजरी जी ही परिवार का नेतृत्व कर रहीं थीं । क्यूंकि गुरु गोविन्द सिंह जी की आयु सिर्फ 09 वर्ष ही थी ।
मानवता के रक्षक ,हिंद की चादर,
गुरु तेग़ बहादुर साहिब जी ने हिमालय की गोद ,कहलूर रियासत(जिला बिलासपुर ) की पवित्र भूमि ,चक्क नानकी (श्री आनंदपुर साहिब) से ही किया था अन्याय के विरुद्ध धर्म युद्ध का शंख नाद किया।
बिलासपुर (कहलूर रियासत)की रानी चम्पा से दान न स्वीकार करके 500 रूपयों में खरीदी थी ताकि एकांतमय जगह पर सुमिरन,साधना,पंथ की स्थापना व धर्म की रक्षा की जा सके ।गुरु जी ने अपनी माता नानकी जी के नाम से चक्क नानकी नगर बसाया बाद में इसे श्री आनंदपुर साहिब के नाम से जाना गया जोकि सिख धर्म के पाँच मुख्य तख़्तो में से एक श्री केशगढ़ साहिब सुशोभित है।
गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ को 30 मार्च 1699 को अंतिम रूप दिया था और बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1699 को इसी पवित्र स्थान पर पाँच प्यारों को अमृत पान करवाकर दीक्षा देकर खालसा रूप में सजाया था व ख़ालसा पंथ की स्थापना की ।तब से श्री केशगढ़ साहिब खालसा का जन्म स्थान कहलाया ।इसी पवित्र भूमि से गुरु तेग़ बहादुर साहिब जी अपनी धर्म पत्नी माता गुजरी जी से आज्ञा लेकर कश्मीरी पंडितों की धर्म रक्षा के लिये दिल्ली गए थे ।
गुरु जी के साथ तीन सिंह साहिवान भाई मती दास जी,भाई सती दास जी ,भाई दयाला जी भी दिल्ली गये । औरंगज़ेब ने गुरु के सामने तीन सरतें रखी 01) कोई चमत्कार करके दिखाओ 02) इस्लाम धर्म अपनाओ ) 03) शहादत को तैयार रहो /मौत को गले लगाओ । गुरु जी ने धर्म की रक्षा के लिए शहादत को चुना ।
औरंगज़ेब ने गुरु जी के सामने तीनों सिंघों को कठोर यातनायें देकर शहीद किया ताकि गुरु जी डर जायें ।लेकिन गुरु जी अडोल रहे । फिर औरंगज़ेब के आदेश से 24-11-1675 को चाँदनी चौंक दिल्ली में गुरु जी का सिर धड़ से अलग कर दिया जहाँ आज गुरुद्वारा श्री शीश गंज साहिब सुशोभित है । भाई जीवन सिंह जी जिन्हें भाई जैता जी के नाम से भी जाना जाता है गुरु जी के कटे सिर को लेकर श्री आनंदपुर साहिब पहुंचे जहाँ गुरु तेग बहादुर साहिब जी के सिर का अंतिम संस्कार हुआ । भाई लखी शाह बंजारा जी ने गुरु जी के धड़ को अपने घर लेकर घर को आग🔥 लगा कर गुरु जी का अंतिम संस्कार किया । आज तक के इतिहास में ऐसा संस्कार किसी का भी कभी नहीं हुआ होगा ।( सिर का अलग जगह व धड़ का अलग जगह)
भारत सरकार व पंजाब सरकार के आदेशानुसार गणतंत्र दिवस शोभायात्रा/झांकी 26 जनवरी 2026 को गुरु तेग बहादुर जी के 350 वे शहीदी समागम को समर्पित कर्तव्य पथ पर शहीदी गुरुद्वारा हिन्द दी चादर के नाम से सुशोभित ,जहाँ गुरु जी का सिर काटा था वही गुरुद्वारा श्री शीशगंज साहिब पूरे भारत वर्ष को दिखाया गया ।
अखिल भारतीय गुर्जर महासभा के प्रदेशाध्यक्ष महेंद्र सिंह हिमाचल प्रदेश ने प्रधानमंत्री नरेंद् मोदी, गृहमंत्री अमित शाह ,स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगतप्रकाश नड्डा व समस्त मंत्रीगण भारत सरकार, समस्त भाजपा नेता हिमाचल प्रदेश और
मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश सुखविंदर सिंह सुखू जी समस्त मंत्रीगण व समस्त कांग्रेस नेता हिमाचल प्रदेश से माँग की है कि AIIMS बिलासपुर हिमाचल प्रदेश का नामकरण हिन्द दी चादर गुरु तेग बहादुर जी के नाम किया जाये ।यही गुरु जी की शहादत को हिन्द के लागों की तरफ़ से सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


