केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला केस की सुनवाई के दौरान भारत के मंदिरों में रीति-रिवाजों का जिक्र किया। एएसजी नटराज ने कहा, दक्षिण भारतीय मंदिरों में प्रसाद के रूप में मदिरा दी जाती है। कल को आप इस पर यह आपत्ति नहीं उठा सकते कि मदिरा न दी जाए।
एक उदाहरण देता हूं, कई मंदिरों में शाकाहारी भोजन परोसा जाता है, और अगर कोई व्यक्ति अपनी पसंद या अंतरात्मा की आवाज पर कहता है कि वह मांसाहारी भोजन करना चाहता है, तो वह किसी खास संप्रदाय के पास जाकर यह नहीं कह सकता कि मेरा यह अधिकार है और मुझे यही परोसा जाना चाहिए। उसे उन श्रद्धालुओं के अधिकारों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े मामलों की बुधवार को लगातार तीसरे दिन सुनवाई कर रही है। इसमें विभिन्न धर्मों में प्रचलित धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरे पर भी विचार किया जा रहा है।
मान लीजिए (सबरीमाला केस को छोड़कर), अगर यह कहा जाए कि सिर्फ गौड़ सारस्वत लोग ही एक मंदिर में आएं या कांची मठ के लोग सिर्फ कांची ही जाएं, दूसरे मठ (जैसे शृंगेरी) न जाएं तो यह ठीक नहीं होगा। बल्कि जितने ज्यादा लोग अलग-अलग मंदिरों और मठों में जाएंगे, उतना ही धर्म मजबूत बनेगा।
आर्टिकल 17 (छुआछूत खत्म करना) बहुत ताकतवर प्रावधान है। यह सिर्फ कानून के तहत अपराध नहीं है, बल्कि एक तरह से संविधान खुद इसे अपराध घोषित करता है। मतलब यह सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि संवैधानिक स्तर पर भी बहुत गंभीर मामला है।
अगर सरकार सामाजिक सुधार के लिए कोई कानून बनाती है और उसका असर धार्मिक प्रथाओं पर पड़ता है। तो उसका असर अनुच्छेद 26 (धार्मिक संस्थाओं के अधिकार) पर भी पड़ सकता है। यानी यह कहना सही नहीं है कि अनुच्छेद 26 पर कभी असर ही नहीं पड़ेगा। इस सवाल का जवाब सिर्फ थ्योरी से नहीं दिया जा सकता। असल में यह हर केस के हिसाब से तय होगा।
अगर कोई मंदिर सिर्फ अपने ही समुदाय के लोगों के लिए रखना चाहता है। तो उन्हें सरकार या आम जनता से फंड (पैसा/दान) नहीं लेना चाहिए। यानी कि अगर आप दूसरों को बाहर रखते हैं, तो दूसरों से मदद भी नहीं ले सकते।
अगर सिर्फ आर्टिकल 26(b) के आधार पर देखें, तो मंदिर में प्रवेश से जुड़ा कानून गलत हो सकता है। यानी कि धार्मिक संस्था को यह अधिकार है कि कौन मंदिर में आएगा, यह वह खुद तय करे। कौन मंदिर में प्रवेश करेगा या पूजा करेगा, अगर यह धार्मिक नियमों से तय होता है तो यह धर्म का हिस्सा है । अगर कोई कानून जबरन एंट्री कराता है, तो वह इस अधिकार का उल्लंघन है।
केरल में जब पुर्तगाली आए, तो उन्होंने वहां के सीरियन ऑर्थोडॉक्स ईसाइयों को कैथोलिक बनाने की कोशिश की। इसी तरह आयरलैंड में जब ब्रिटिश शासन था, तो कैथोलिक लोगों के साथ भेदभाव किया जाता था। कुल मिलाकर बात यह है कि धर्म से जुड़े ऐसे विवाद बहुत संवेदनशील होते हैं, इसलिए अदालतें आमतौर पर इनमें हस्तक्षेप नहीं करतीं या फैसला नहीं देतीं।
अगर मंदिरों में शाकाहारी भोजन परोसा जा रहा है लेकिन कोई मांसाहारी भोजन करना चाहता है। तो वह किसी खास संप्रदाय के पास जाकर यह नहीं कह सकता कि मेरा यह अधिकार है और मुझे यही परोसा जाना चाहिए।


