सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के बाद तीन मुद्दों पर अपना अंतरिम आदेश सुरक्षित रख लिया है। इन मुद्दों कोर्ट द्वारा वक्फ घोषित संपत्तियों को डिनोटिफाई करना, वक्फ-बाय-यूजर या वक्फ बाय डीड शामिल है। फैसला सुरक्षित रखने से पहले सुप्रीम कोर्ट ने लगातार तीन दिन सुनवाई की।
गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि वक्फ के दर्जे को लेकर एक बार जांच शुरू हो जाए तो रिपोर्ट आने तक वक्फ का दर्जा खत्म हो जाता है। सिब्बल ने ये भी कहा,
इस पर CJI ने कहा कि जमीन का रजिस्ट्रेशन क्यों नहीं कराया गया? इस पर कपिल सिब्बल ने कहा, उन्होंने (मुस्लिम समुदाय) रजिस्ट्रेशन इसलिए नहीं कराया, क्योंकि यह राज्य की जिम्मेदारी थी, अब वे (सरकार) कहते हैं कि उन्होंने रजिस्ट्रेशन नहीं कराया, इसलिए यह समुदाय की गलती है। यदि आपके पास शक्ति है तो आप खुद की गलती का लाभ नहीं उठा सकते।
SG तुषार मेहता ने सेक्शन 3E पर बात की। कहा कि सेक्शन 3E अनुसूचित क्षेत्रों के अंतर्गत आने वाली भूमि पर वक्फ के निर्माण पर रोक लगाता है। यह प्रोविजन अनुसूचित जनजाति के संरक्षण के लिए था।
अनुसूचित क्षेत्रों में अनुसूचित जनजाति को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। मान लीजिए कि मैं जमीन बेचता हूं और पता चलता है कि जमीन के लेन-देन में ST समुदाय के व्यक्ति के साथ धोखा हुआ है तो जमीन वापस दी जा सकती है, लेकिन वक्फ कहता है कि दान दी गई जमीन को वापस नहीं लिया जा सकता।
चीफ जस्टिस गवई ने इसके पीछे का तर्क पूछा तो SG मेहता ने कहा कि वक्फ का निर्माण अपरिवर्तनीय है और इससे कमजोर आदिवासी आबादी के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का कहना है कि आदिवासी इस्लाम अपना सकते हैं, लेकिन उनकी अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान है।
इस पर जस्टिस मसीह ने कहा- यह सही नहीं लगता। इस्लाम तो इस्लाम है! धर्म एक ही है।
SG मेहता ने कहा JPC का कहना है कि अनुसूचित क्षेत्रों के ST समुदाय के लोग इस्लाम का उस तरह से पालन नहीं करते हैं, जितना बाकी जगह होता है क्योंकि उनकी एक अलग सांस्कृतिक पहचान है। इस पर जस्टिस मसीह ने कहा कि आप यह कैसे कह सकते हैं, इस्लाम धर्म हर जगह एक जैसा ही रहता है। हालांकि सांस्कृतिक प्रथाएं अलग-अलग हो सकती हैं।


