तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने सरकार की ओर से पारित 2 बिलों को मंजूरी दे दी है। इनसे 12,000 से ज्यादा दिव्यांगजनों को शहरी और स्थानीय निकायों में नामांकन का अधिकार मिलेगा। ये बिल लंबे समय से राजभवन में लंबित थे।
राज्यपाल के इस फैसले पर मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने कहा- यह मंजूरी मिलनी ही थी। राज्यपाल को डर था कि अगर फिर से बिलों को रोका तो हम सुप्रीम कोर्ट चले जाएंगे।
8 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु गवर्नर और राज्य सरकार के मामले पर राज्यपाल के अधिकार की सीमा तय कर दी थी। बेंच ने कहा था- राज्यपाल के पास कोई वीटो पावर नहीं है। साथ ही सरकार के 10 जरूरी बिलों को राज्यपाल की ओर से रोके जाने को अवैध भी बताया था।
कोर्ट ने कहा था कि यह मनमाना कदम है और कानून के नजरिए से सही नहीं है। राज्यपाल को राज्य की विधानसभा को मदद और सलाह देनी चाहिए थी। आदेश दिया कि विधानसभा से पास बिल पर राज्यपाल एक महीने के भीतर कदम उठाएं।
सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु सरकार की तरफ दायर याचिका पर सुनवाई हुई थी। इसमें कहा गया था कि राज्यपाल आरएन रवि ने राज्य के जरूरी बिलों को रोककर रखा है। बता दें कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) में काम कर चुके पूर्व IPS अधिकारी आरएन रवि ने 2021 में तमिलनाडु के राज्यपाल का पद संभाला था।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल को 2 निर्देश दिए थे
- सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल को निर्देश दिया कि उन्हें अपने विकल्पों का इस्तेमाल तय समय-सीमा में करना होगा, वरना उनके उठाए गए कदमों की कानूनी समीक्षा की जाएगी।
- कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल बिल रोकें या राष्ट्रपति के पास भेजें, उन्हें यह काम मंत्रिपरिषद की सलाह से एक महीने के अंदर करना होगा। विधानसभा बिल को दोबारा पास कर भेजती है, तो राज्यपाल को एक महीने के अंदर मंजूरी देनी होगी।
कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि वह राज्यपाल की शक्तियों को कमजोर नहीं कर रहा, लेकिन राज्यपाल की सारी कार्रवाई संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांतों के अनुसार होनी चाहिए।


