कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी MGNREGA को खत्म करने से गांवों में रहने वाले करोड़ों लोगों पर बुरा असर पड़ेगा। मनरेगा खत्म होना सामूहिक नाकामी है। इसके खिलाफ सभी से एकजुट होना चाहिए।
सोनिया गांधी ने 22 दिसंबर को अंग्रेजी अखबार The Hindu में पब्लिश अपने कॉलम ‘द बुलडोजर डिमॉलिश ऑफ मनरेगा’ में यह बात कही। उनका कॉलम तब आया है, जब राष्ट्रपति मुर्मू विकसित भारत ग्रामीण रोजगार आजीविका मिशन (ग्रामीण) (VB-G RAM G) बिल को मंजूरी दे चुकी हैं, जो मनरेगा की जगह लेगा।
इस नए कानून में ग्रामीण मजदूरों को 125 दिन काम देने की गारंटी दी गई है। संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान 16 दिसंबर को लोकसभा से VB-G-RAM-G बिल पास किया गया था। 18 दिसंबर को इसे राज्यसभा से पास किया गया था।
मनरेगा महात्मा गांधी के सर्वोदय यानि ‘सबका कल्याण’ के विचार पर आधारित था। इसने काम के अधिकार को मजबूत किया है। संकट से बचने के लिए ग्रामीणों के लिए बने इस रोजगार गारंटी कानून को बुलडोजर चलाकर खत्म कर दिया गया है।
MGNREGA संविधान के अनुच्छेद 41 से प्रेरित था, जिसमें नागरिकों को काम का अधिकार देने की बात कही गई है। मोदी सरकार ने बिना चर्चा, बिना सलाह और संसद की प्रक्रिया का सम्मान किए बिना योजना को खत्म कर दिया। जबकि महात्मा गांधी का नाम हटाना तो सिर्फ शुरुआत थी, असल में पूरी योजना को ही खत्म कर दिया गया है।
इस योजना का दायरा अब केंद्र सरकार की मर्जी से होगा। पहले जहां बजट की कोई सीमा नहीं थी। अब तय बजट होगा, जिससे राज्यों में काम के दिनों की संख्या सीमित हो जाएगी। इससे सालभर रोजगार की गारंटी खत्म हो जाएगी।
मनरेगा की सबसे बड़ी सफलता थी कि इससे ग्रामीण गरीबों, खासकर भूमिहीन मजदूरों की सौदेबाजी की ताकत बढ़ी और मजदूरी में सुधार हुआ। नया कानून इस ताकत को कमजोर कर देगा। सरकार मजदूरों का पैसा बढ़ने से रोकना चाहती है, जबकि आजादी के बाद पहली बार कृषि क्षेत्र में रोजगार बढ़ा है।
सरकार झूठा दावा कर रही है कि रोजगार 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है। मोदी सरकार ने पिछले 10 सालों में बजट रोकी, तकनीकी मुश्किलें खड़ी की और मजदूरों को देर से पैसा देकर मनरेगा को कमजोर किया है।


