सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को देशभर में महिला छात्रों और कामकाजी महिलाओं को पीरियड्स में पेड लीव देने की मांग वाली याचिका खारिज हो गई।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता के अधिकार क्षेत्र पर भी सवाल उठाया और कहा कि इस मामले को लेकर खुद कोई महिला कोर्ट में नहीं आई है।
पेड मेंस्ट्रुअल लीव की याचिका लेकर शैलेंद्र मणि तीसरी बार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। पहली याचिका का निपटारा फरवरी 2023 में किया गया था, जिसमें याचिकाकर्ता को केंद्रीय महिला एवं बाल मंत्रालय के समक्ष अपना पक्ष रखने की अनुमति दी गई थी।
2024 में याचिकाकर्ता ने फिर कोर्ट में याचिका लगाई और कहा कि मंत्रालय ने उनके पक्ष में दिए गए जवाब पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उस याचिका का निपटारा जुलाई 2024 में किया गया था, जिसमें केंद्र सरकार से नीतिगत निर्णय लेने को कहा गया था।
भारत सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को ऐसे कानून/नीतियां/सरकारी आदेश लाने का निर्देश देना जो मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को होने वाली पीड़ा (डिसमेनोरिया, एंडोमेट्रियोसिस, गर्भाशय फाइब्रॉइड, एडिनोमायोसिस, पेल्विक इन्फ्लेमेटरी डिजीज) से संबंधित समस्याओं को मान्यता देते हों और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के अनुरूप छुट्टी देने समेत सभी जरूरी राहतें देते हों।
संविधान के अनुच्छेद 32 के साथ अनुच्छेद 14, 21 और अनुच्छेद 141 और 142 के तहत शक्ति का प्रयोग करते हुए कामकाजी महिलाओं और महिला छात्रों को अवकाश के रूप में राहत प्रदान करने के संबंध में मौजूद कमियों को दूर करने के लिए निर्देश जारी करें।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि OBC आरक्षण में क्रीमी लेयर का फैसला केवल माता-पिता की आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। माता-पिता या अभिभावकों के पद (पोस्ट) और सामाजिक स्थिति (स्टेटस) को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। अगर सरकारी कर्मचारियों के बच्चों और प्राइवेट या PSU कर्मचारियों के बच्चों को अलग-अलग तरीके से आरक्षण दिया जाए तो यह अनुचित भेदभाव होगा।


