सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को राष्ट्रपति और राज्यपालों पर बिलों पर हस्ताक्षर करने के लिए डेडलाइन लागू करने वाली याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान कोर्ट ने कहा, ‘राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का आर्टिकल 143 के तहत कोर्ट से राय मांगना गलत नहीं है।’
मुर्मू ने मई में सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी थी कि क्या राष्ट्रपति या राज्यपाल विधेयकों पर फैसला लेने में अनिश्चितकाल तक देरी कर सकते हैं या कोई डेडलाइन तय की जा सकती है।
मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई समेत 5 जजों की बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति सलाहकारी अधिकारिता (एडवाइजरी ज्यूरिडिक्शन) में बैठी है, न कि अपील अधिकारिता (अपीलेट ज्यूरिस्डिक्शन) में। कोर्ट यह राय दे सकता है कि कोई फैसला सही नहीं है, लेकिन इससे पुराना फैसला अपने आप खत्म नहीं हो जाएगा।
इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एक पुराने मामले का हवाला देते हुए कहा कि सलाहकारी अधिकार क्षेत्र में भी कोर्ट किसी फैसले को रद्द कर सकता है। जवाब में चीफ जस्टिस ने कहा, ‘राय को बदला जा सकता है, फैसला नहीं।’
ये मामला तमिलनाडु गवर्नर और राज्य सरकार के बीच हुए विवाद से उठा था। जहां गवर्नर से राज्य सरकार के बिल रोककर रखे थे। सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को आदेश दिया कि राज्यपाल के पास कोई वीटो पावर नहीं है। इसी फैसले में कहा था कि राज्यपाल की ओर से भेजे गए बिल पर राष्ट्रपति को 3 महीने के भीतर फैसला लेना होगा। यह ऑर्डर 11 अप्रैल को सामने आया था। इसके बाद राष्ट्रपति ने मामले में सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी और 14 सवाल पूछे थे।
19 अगस्त का विषय: केरल और तमिलनाडु सरकार की शुरुआती आपत्तियों पर सुनवाई हुई। दोनों राज्यों का उनका कहना है कि राष्ट्रपति ने जो सवाल उठाए हैं, उनमें से ज्यादातर का जवाब पहले ही तमिलनाडु वाले फैसले में मिल चुका है।
SC बेंच: CJI बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर ने सुनवाई की।
सरकार की तरफ से: अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता शामिल हुए।
केरल सरकार की तरफ से: सीनियर एडवोकेट केके वेणुगोपाल शामिल हुए।
तमिलनाडु की तरफ से: अभिषेक मनु सिंघवी शामिल हुए।


