सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को आवारा कुत्तों से जुड़े मामले पर सुनवाई हुई। कोर्ट ने पूछा कि कुत्तों के कारण आम लोगों को आखिर कब तक परेशानी झेलनी पड़ेगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका आदेश सड़कों के लिए नहीं, बल्कि केवल संस्थागत क्षेत्रों के लिए है।
पीठ ने सवाल उठाया कि स्कूलों, अस्पतालों और अदालत परिसरों के भीतर आवारा कुत्तों की क्या आवश्यकता है और उन्हें वहां से हटाने पर क्या आपत्ति हो सकती है।
बुधवार को मामले की सुनवाई ढाई घंटे तक चली। अगली सुनवाई 8 जनवरी को सुबह 10.30 बजे से फिर शुरू होगी।
सीनियर एडवोकेट सीयू सिंह ने दलील देते हुए कहा कि सवाल यह नहीं है कि DU या सुप्रीम कोर्ट कैंपस में कुत्तों की जरूरत है या नहीं। लेकिन कुत्ते एक सच्चाई हैं। सवाल यह है कि वे इंसानों को नुकसान कैसे न पहुंचाएं और इससे निपटने का सबसे अच्छा तरीका क्या है।
सीनियर एडवोकेट केके वेणुगोपाल (NALSAR, हैदराबाद के लिए) ने कहा कि इस यूनिवर्सिटी में एक एनिमल लॉ सेंटर है। इसमें एनिमल प्रोटेक्शन में मास्टर्स कोर्स और पीजी डिप्लोमा भी है। एनिमल प्रोटेक्शन के संबंध में इसका हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के साथ MoU है। हमारी जांच में ऐसे आंकड़े सामने आए हैं जो पहले कोर्ट के सामने नहीं रखे गए थे।
SG तुषार मेहता ने कहा, जब हम पशु प्रेमी कहते हैं तो जानवरों में सभी जानवर शामिल होते हैं, सिर्फ कुत्ते नहीं। मैं अपने घर में कुत्ता रखना चाहता हूं या नहीं, यह मेरा विवेक होना चाहिए। क्या कुत्ते मेरी गेटेड कम्युनिटी में घूमते रहने चाहिए, यह हमें ही तय करना होगा। जहां 90% निवासियों को लगता है कि यह विनाशकारी होगा और 10% जोर देते हैं कि कुत्ते रहें… कोई भैंस ला सकता है और कह सकता है कि मैं पशु प्रेमी हूं। इससे दूसरे सदस्यों को दिक्कतें हो सकती हैं। गेटेड कम्युनिटी (क्लोज कैंपस) वगैरह वोटिंग से फैसला करें। हम डेमोक्रेटिक सिस्टम में रह रहे हैं।
एनिमल राइट एक्टिविस्ट वंदना जैन ने कहा- दो समस्याएं हैं। पहली है कुत्तों की आबादी। जब तक हमें यह नहीं पता चलेगा कि कितने कुत्ते हैं, तब तक हमें यह नहीं पता चलेगा कि हमें कितने नसबंदी केंद्रों की जरूरत है, कितने डॉक्टरों चाहिए होंगे, कितने शेल्टर की बनाने होंगे। जब तक हमें कुत्तों की संख्या नहीं पता होगी, हम कुत्तों की आबादी को कंट्रोल नहीं कर सकते।
कुत्ते हमें क्यों नहीं काटते? हम उनके प्रति दया का भाव रखते हैं। अगर दूसरे नागरिक भी ऐसी ही दया दिखाएं तो यह समस्या हल नहीं हो सकती क्या। लोगों में जागरूकता होनी चाहिए। हमें लोगों को नसबंदी के महत्व के बारे में भी शिक्षित करने की जरूरत है। भारत को बदलने का एकमात्र तरीका लोगों को पशु सेवा में शामिल करना है।
वंदना जैन ने कहा अगर हम विदेशी नस्ल के कुत्तों पर एक्स्ट्रा लग्जरी टैक्स लगाते हैं तो हम ज्यादा लोगों को देसी कुत्ते गोद लेने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं।


