एक दशक से मुफ्त की योजनाएं (फ्री स्कीम) और सब्सिडी राज्यों की सत्ता पाने का ‘शर्तिया नुस्खा’ है। लेकिन राज्यों की बिगड़ती वित्तीय सेहत इस नुस्खे का बड़ा साइड इफेक्ट बनकर सामने आ रही है। राज्यों के पास बिजली, सड़क और आवास के लिए पैसा ही नहीं है।
उनकी कमाई और खर्च का लेखाजोखा बताता है कि सब्सिडी, वेतन, पेंशन और ब्याज की अदायगी जैसे अहम खर्चों के बाद राज्यों के हाथ अपनी कमाई का 20-25% हिस्सा ही बच पा रहा है। पंजाब जैसे राज्य के हाथ तो खर्च के लिए 7% राशि ही बची।
हालांकि, इस साल पंजाब को ₹90 हजार करोड़ का मूलधन भी चुकाना है। इसलिए इस बची राशि के साथ मूलधन चुकाने के लिए पंजाब को भारी भरकम कर्ज की जरूरत होगी। पंजाब अक्टूबर 2025 में ₹20 हजार करोड़ का कर्ज बाजार से ले चुका है।
राजस्थान को इस बार ₹1.50 लाख करोड़ कर्ज का मूलधन चुकाना है। वह 32 हजार करोड़ रुपए कर्ज ले चुका है, लेकिन बकाया तो कर्ज लेने की सीमा से भी ज्यादा है। उसे कर्ज चुकाने के लिए भी कर्ज लेने की जरूरत पड़ेगी।
मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, बिहार जैसे राज्यों का कर्ज उनकी जीडीपी की तुलना में एक तिहाई के करीब है या ज्यादा है। ऐसे में इन पर आने वाले सालों में मूलधन की अदायगी का बोझ और बढ़ सकता है।
बिहार में चुनावी वादे पूरे करने पर आने वाला बोझ राज्य के पूंजीगत व्यय का 25 गुना हो सकता है। राज्य दिवालिया हो सकता है।
महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों का अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा केवल वेतन, पेंशन और अन्य जरूरी खर्च में चला जाता है। विकास के लिए एक छोटी राशि ही मिलती है।
राजस्थान, समेत कई राज्यों में 45 गीगावॉट की सौर, पवन ऊर्जा क्षमता अटकी हुई हैं, क्योंकि सरकारें बिजली खरीद समझौते पर हस्ताक्षर तक नहीं कर पा रही हैं।

