डॉ हेमलता शर्मा ✒
दक्षिण एशिया की राजनीति अक्सर शतरंज की बिसात जैसी रही है—जहाँ मोहरे बदलते हैं, पर खेल वही रहता है। आज एक बार फिर अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच बढ़ता तनाव इस बात का संकेत है कि इतिहास ने अपना चक्र पूरा नहीं किया, बल्कि वह फिर उसी मोड़ पर खड़ा है।
कल का संरक्षक, आज का संदिग्ध
कभी पाकिस्तान पर आरोप लगता रहा कि उसने अफगानिस्तान में प्रभाव बनाए रखने के लिए विभिन्न गुटों का समर्थन किया। आज स्थिति उलटती दिख रही है। सत्ता में बैठा तालिबान अब पाकिस्तान के लिए भी असहजता का कारण बन गया है। टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) की गतिविधियाँ इस रिश्ते में बारूद भर रही हैं। पाकिस्तान जिस रणनीति को दशकों तक “रणनीतिक गहराई” कहता रहा, वही आज उसकी आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती बनती दिख रही है।
परमाणु शक्ति और असुरक्षा का द्वंद्व पाकिस्तान परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र है, परंतु उसकी आंतरिक अस्थिरता—आर्थिक संकट, राजनीतिक संघर्ष और सुरक्षा चुनौतियाँ—उसे कमजोर स्थिति में खड़ा करती हैं।
यदि सीमा झड़पें बढ़ती हैं, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता केवल क्षेत्रीय नहीं, वैश्विक होगी। एक परमाणु राष्ट्र का अस्थिर पड़ोसी से सैन्य टकराव विश्व शांति के लिए गंभीर संकेत है।चीन और अमेरिका की रणनीतिक निगाह इस पूरे समीकरण में चीन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। चीन-पाक आर्थिक गलियारा (CPEC) उसकी बेल्ट एंड रोड नीति का प्रमुख हिस्सा है। क्षेत्रीय अस्थिरता इस परियोजना को सीधे प्रभावित कर सकती है।
दूसरी ओर अमेरिका, जिसने अफगानिस्तान से वापसी की, पूरी तरह निष्क्रिय नहीं है। वह चाहता है कि यह क्षेत्र आतंकवाद का पुनः सुरक्षित ठिकाना न बने।
यह संघर्ष यदि बढ़ता है, तो यह केवल सीमा विवाद नहीं रहेगा, बल्कि महाशक्तियों की अप्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धा का मंच बन सकता है।सबसे बड़ा शिकार आम जनता है हर युद्ध की तरह, यहाँ भी सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक का होगाअफगानिस्तान पहले ही मानवीय संकट से जूझ रहा है। पाकिस्तान आर्थिक अस्थिरता में है। ऐसे में युद्ध दोनों देशों को दशकों पीछे धकेल सकता है।
दुनिया क्या चाहती है – दुनिया की अपेक्षा स्पष्ट है—
आतंकवाद पर कठोर नियंत्रण
सीमा विवाद का कूटनीतिक समाधान मानवीय संकट से बचाव परमाणु जोखिम से दूरी
पर सवाल यह है: क्या नेतृत्व भावनाओं से ऊपर उठकर विवेक का चयन करेगा?
निष्कर्ष: युद्ध नहीं, बुद्धिमत्ता की परीक्षा
अफगानिस्तान और पाकिस्तान का यह तनाव केवल सैन्य शक्ति की परीक्षा नहीं, बल्कि राजनीतिक परिपक्वता की कसौटी है। यदि इतिहास से सबक नहीं लिया गया, तो यह संघर्ष केवल दो देशों को नहीं, पूरे दक्षिण एशिया को अस्थिर कर सकता है। पर यदि संवाद का मार्ग चुना गया, तो यही संकट क्षेत्रीय सहयोग की नई शुरुआत भी बन सकता है।


