- डॉ हेमलता शर्मा की कलम से
विश्व राजनीति आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ शक्ति, नैतिकता और स्वार्थ का टकराव खुलकर दिखाई देता है। वैश्विक मंच पर संयुक्त राज्य अमेरिका की भूमिका को लेकर गहरे मतभेद हैं। कोई उसे लोकतंत्र का प्रहरी कहता है, तो कोई उसे अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का स्वयंभू ठेकेदार। प्रश्न यह है कि उसकी आक्रामक विदेश नीति विश्व को किस दिशा में ले जा रही है?
शीत युद्ध की समाप्ति और सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका निर्विवाद महाशक्ति बनकर उभरा। एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था में उसने स्वयं को नियम-निर्माता और न्यायाधीश दोनों की भूमिका में स्थापित कर लिया। “लोकतंत्र की रक्षा” और “आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध” जैसे नारों के साथ उसने कई देशों में सैन्य हस्तक्षेप किए—जैसे इराक और अफगानिस्तान। इन अभियानों ने तानाशाहों को हटाया, परंतु क्या उन्होंने स्थायी शांति दी? इराक आज भी सांप्रदायिक तनाव और अस्थिरता से जूझता है, और अफगानिस्तान में दो दशकों के युद्ध के बाद भी सत्ता का चक्र वहीं लौट आया जहाँ से चला था।
अमेरिका की शक्ति केवल सैन्य नहीं, आर्थिक भी है। डॉलर-आधारित वैश्विक व्यवस्था और प्रतिबंधों की नीति ने उसे आर्थिक हथियार प्रदान किया है। ईरान और रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों ने यह संदेश दिया कि जो अमेरिकी नीतियों के विरुद्ध जाएगा, उसे आर्थिक दंड भुगतना होगा। लेकिन इसका परिणाम क्या हुआ? विश्व अर्थव्यवस्था खेमों में बँटने लगी। वैकल्पिक व्यापार तंत्र और नए गठबंधन उभरने लगे। चीन, भारत और अन्य उभरती शक्तियाँ बहुध्रुवीय विश्व की अवधारणा को बल दे रही हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न नैतिक नेतृत्व का है। यदि लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा ही उद्देश्य है, तो क्या वह सिद्धांत हर स्थान पर समान रूप से लागू होता है? या फिर सामरिक हितों के अनुसार बदल जाता है? यही वह बिंदु है जहाँ अमेरिका की छवि पर प्रश्नचिह्न लगते हैं। जब शक्तिशाली राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को अपने हित में मोड़ते दिखाई देते हैं, तो छोटे देशों में अविश्वास गहराता है।
विश्व संगठन, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र, भी इस शक्ति-संतुलन के संघर्ष में कमजोर पड़ते दिखते हैं। वीटो शक्ति और कूटनीतिक दबाव के कारण वैश्विक संस्थाएँ कई बार निष्प्रभावी प्रतीत होती हैं। परिणामस्वरूप, अंतर्राष्ट्रीय कानून की जगह “शक्ति का कानून” प्रभावी होता दिखता है।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है। अमेरिका तकनीकी नवाचार, वैश्विक व्यापार, शिक्षा और मानवीय सहायता में भी अग्रणी रहा है। अनेक देशों की अर्थव्यवस्थाएँ और सुरक्षा ढाँचे उसके सहयोग से सशक्त हुए हैं। इसलिए उसे केवल “गुंडागर्दी” के चश्मे से देखना भी एकांगी दृष्टि हो सकती है।
फिर भी, यदि महाशक्तियाँ प्रतिस्पर्धा और प्रभुत्व की राजनीति में उलझी रहीं, तो विश्व “शीत युद्ध 2.0” जैसी स्थिति की ओर बढ़ सकता है—जहाँ प्रत्यक्ष युद्ध कम, परंतु प्रॉक्सी युद्ध, साइबर हमले और आर्थिक संघर्ष अधिक होंगे। इससे वैश्विक शांति और विकास बाधित होंगे।
आज आवश्यकता है संतुलन की। बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, जहाँ शक्ति कई केंद्रों में बँटी हो, संभवतः अधिक न्यायसंगत और स्थिर हो सकती है। उभरती शक्तियों और क्षेत्रीय संगठनों को मिलकर ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना होगा जहाँ नियम सभी पर समान रूप से लागू हों—चाहे वह महाशक्ति हो या छोटा राष्ट्र।
अंततः, विश्व किस दिशा में जाएगा, यह केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं है। यह वैश्विक समुदाय की सामूहिक बुद्धिमत्ता, नैतिक साहस और संवाद की क्षमता पर निर्भर है। यदि शक्ति के साथ जिम्मेदारी का संतुलन नहीं बना, तो विश्व अस्थिरता की ओर जाएगा। लेकिन यदि प्रतिस्पर्धा के स्थान पर सहयोग को प्राथमिकता दी गई, तो यही संक्रमण काल एक अधिक न्यायपूर्ण और संतुलित विश्व व्यवस्था का मार्ग भी प्रशस्त कर सकता है।


