डॉ. हेमलता शर्मा
आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया मानव जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। सूचना, संचार और अभिव्यक्ति का यह सशक्त माध्यम जहाँ एक ओर समाज को जोड़ता है, वहीं दूसरी ओर इसके दुरुपयोग ने सामाजिक संस्कारों के क्षरण की गंभीर समस्या भी खड़ी कर दी है।
सोशल मीडिया पर बढ़ती अश्लीलता, अपशब्दों का प्रयोग, झूठी सूचनाएँ, नफरत फैलाने वाली सामग्री और दिखावटी जीवन-शैली समाज के नैतिक मूल्यों को कमजोर कर रही है। युवा वर्ग, जो समाज की रीढ़ होता है, वह लाइक-शेयर-फॉलोअर्स की दौड़ में संयम, सम्मान, सहनशीलता और पारिवारिक मूल्यों से दूर होता जा रहा है। बड़ों के प्रति आदर, भाषा की मर्यादा और विचारों की शालीनता लगातार घटती दिखाई देती है।
इसके अतिरिक्त, सोशल मीडिया पर तत्काल प्रसिद्धि पाने की चाह ने गलत प्रवृत्तियों को जन्म दिया है। कई बार लोग बिना तथ्य जाँचे किसी को बदनाम कर देते हैं, जिससे सामाजिक संबंधों में अविश्वास बढ़ता है। आभासी दुनिया में जीने की आदत ने वास्तविक जीवन के रिश्तों को भी कमजोर किया है।
हालाँकि यह कहना भी उचित नहीं होगा कि सोशल मीडिया पूर्णतः नकारात्मक है। सही दिशा और संस्कारयुक्त उपयोग से यह शिक्षा, जागरूकता, सामाजिक सुधार और सकारात्मक संवाद का सशक्त साधन बन सकता है। आवश्यकता है मीडिया साक्षरता, अभिभावकीय मार्गदर्शन और आत्म-नियंत्रण की।
सोशल मीडिया स्वयं में न तो संस्कारहीन है और न ही संस्कारयुक्त; उसका प्रभाव उपयोगकर्ता की सोच और उपयोग पर निर्भर करता है। यदि समाज ने समय रहते संतुलित और जिम्मेदार उपयोग नहीं अपनाया, तो यह माध्यम वास्तव में संस्कारहीन समाज के निर्माण में सहायक बन सकता है।

