मनुष्य ने जब पहली बार अपने भीतर कुछ हलचल महसूस की, उसी क्षण से उसकी यात्रा शुरू हो गई। वह हलचल न शब्द थी, न विचार, न दर्शन। वह केवल एक अनुभूति थी। कुछ ऐसा जो भीतर से उठता है, आगे बढ़ना चाहता है, जानना चाहता है, छूना चाहता है, पाना चाहता है। यही अनुभूति आगे चलकर इच्छा कहलाती है। मनुष्य का पूरा जीवन इसी इच्छा के चारों ओर घूमता है, फिर भी आश्चर्य यह है कि उसने इच्छा को सबसे कम समझा है।
मनुष्य बार-बार यह प्रश्न पूछता है कि मैं कौन हूँ, लेकिन वह यह नहीं देख पाता कि यह प्रश्न भी इच्छा से ही जन्म लेता है। जानने की इच्छा, समझने की इच्छा, अपने अस्तित्व को पहचानने की इच्छा। जब कोई बच्चा पहली बार अपने आसपास की दुनिया को देखता है, तो उसके भीतर कोई सिद्धांत नहीं होता, कोई धर्म नहीं होता, कोई दर्शन नहीं होता। उसके भीतर केवल अनुभव होता है। वह अनुभव ही उसकी पहली शिक्षा है। वह अनुभव ही उसकी पहली साधना है।
इच्छापूर्ति दर्शन इसी मूल बिंदु से आरंभ होता है। यह दर्शन यह मानकर नहीं चलता कि मनुष्य गलत है या अधूरा है। यह यह मानकर चलता है कि मनुष्य ने अपने अनुभव को समझने के स्थान पर उसे दबाना सीख लिया है। उसे सिखाया गया कि इच्छा बंधन है, जबकि कभी यह नहीं बताया गया कि इच्छा चेतना की पहली अभिव्यक्ति है।
मनुष्य जन्म से पहले भी इच्छा के कारण ही अस्तित्व में आता है। दो इच्छाओं के मिलन से एक नया जीवन जन्म लेता है। जन्म के बाद भी मनुष्य का हर श्वास, हर कदम, हर निर्णय किसी न किसी इच्छा से जुड़ा होता है। फिर भी वह जीवन भर यह सोचता रहता है कि इच्छा से मुक्ति कैसे मिले। यही विरोधाभास उसकी सबसे बड़ी पीड़ा बन जाता है।
इच्छापूर्ति दर्शन यह नहीं कहता कि इच्छा छोड़ दो और मुक्त हो जाओ। यह कहता है कि इच्छा को समझो, क्योंकि बिना समझे छोड़ी गई इच्छा दबाव बन जाती है, और दबाई गई इच्छा विकृति बन जाती है। विकृत इच्छा ही दुख, संघर्ष, रोग और असंतुलन का कारण बनती है। जब वही इच्छा समझ के साथ देखी जाती है, तो वह साधना बन जाती है, सेवा बन जाती है, और अंततः शांति का मार्ग बनती है।
यह दर्शन विचारों से नहीं, अनुभव से संवाद करता है। क्योंकि विचार मनुष्य को प्रभावित करते हैं, लेकिन अनुभव मनुष्य को बदलते हैं। यही कारण है कि इस ग्रंथ का प्रत्येक पृष्ठ किसी न किसी अंतरराष्ट्रीय मानवीय अनुभव से आरंभ होता है। संसार बदल सकता है, सभ्यताएँ बदल सकती हैं, भाषाएँ बदल सकती हैं, लेकिन मनुष्य का अनुभव हर जगह एक जैसा रहता है। दुख का स्वाद हर जगह समान होता है। खुशी की अनुभूति हर जगह समान होती है। इच्छा की धड़कन हर हृदय में एक जैसी सुनाई देती है।
मनुष्य ने इतिहास में अनगिनत दर्शन रचे, लेकिन अधिकतर दर्शन अनुभव से ऊपर विचार को रखकर बने। इच्छापूर्ति दर्शन पहली बार अनुभव को केंद्र में रखता है। यह दर्शन पूछता है कि आपने क्या पढ़ा, यह नहीं; यह पूछता है कि आपने क्या जिया है। क्योंकि जो जिया गया है, वही सत्य बनता है।
इस ग्रंथ का पहला खंड मनुष्य के व्यक्तिगत अनुभव से शुरू होता है। यह ब्रह्मांड से शुरू नहीं होता, यह शास्त्रों से शुरू नहीं होता, यह किसी मान्यता से शुरू नहीं होता। यह आपसे शुरू होता है। उस क्षण से जब आपने पहली बार यह महसूस किया कि आपके भीतर कुछ है जो उत्तर मांग रहा है। उस क्षण से जब आपने पहली बार यह जाना कि जीवन केवल चलना नहीं है, बल्कि महसूस करना भी है।
धीरे-धीरे यह यात्रा व्यक्ति से समाज की ओर जाती है, समाज से प्रकृति की ओर जाती है, और प्रकृति से ब्रह्मांड की ओर बढ़ती है। लेकिन यह यात्रा बाहर नहीं जाती, यह भीतर उतरती है। क्योंकि ब्रह्मांड बाहर नहीं, भीतर प्रतिबिंबित होता है। जब तक मनुष्य अपने भीतर की इच्छा को नहीं समझता, तब तक वह बाहर के ब्रह्मांड को भी नहीं समझ सकता।
इच्छापूर्ति दर्शन यह स्पष्ट करता है कि धर्म, कर्म, साधना, ज्ञान और भक्ति भी इच्छा के ही परिष्कृत रूप हैं। अंतर केवल इतना है कि कुछ इच्छाएँ अचेतन होती हैं और कुछ इच्छाएँ चेतन। जब इच्छा अचेतन होती है, तो वह भोग बनती है। जब इच्छा चेतन होती है, तो वही भक्ति बन जाती है।
मनुष्य की समस्या यह नहीं है कि वह चाहता है। उसकी समस्या यह है कि वह नहीं जानता कि वह क्या चाहता है और क्यों चाहता है। इसी अज्ञान से संघर्ष पैदा होता है। इसी संघर्ष से थकान पैदा होती है। और इसी थकान से जीवन में खालीपन आता है।
इच्छापूर्ति दर्शन इस खालीपन को भरने का प्रयास नहीं करता। यह इस खालीपन को समझने का मार्ग दिखाता है। क्योंकि जो खालीपन समझ लिया जाता है, वह स्वयं भर जाता है।
यह ग्रंथ किसी को नया विश्वास देने नहीं आया है। यह किसी को किसी विचारधारा में बांधने नहीं आया है। यह केवल यह कहता है कि अपने अनुभव को देखिए, उससे भागिए नहीं। क्योंकि जब आप अपने अनुभव से जुड़ते हैं, तो आपको किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती।
इस पहले खंड में पूछे जाने वाले प्रश्न साधारण हैं, लेकिन उनके उत्तर सरल नहीं हैं। ये प्रश्न आपको परेशान करने के लिए नहीं, आपको जगाने के लिए हैं। हर प्रश्न के बाद एक ठहराव रखा गया है, ताकि पाठक उत्तर खोजने बाहर नहीं, भीतर जाए।
यह ग्रंथ तेज़ी से पढ़ने के लिए नहीं लिखा गया है। यह ठहरकर जीने के लिए लिखा गया है। हर पृष्ठ आपको आगे नहीं, गहराई में ले जाएगा। क्योंकि इच्छापूर्ति दर्शन की यात्रा ऊँचाई की नहीं, गहराई की यात्रा है।
जब आप इस ग्रंथ को पढ़ेंगे, तो संभव है कि कई बार आपको असहजता महसूस हो। क्योंकि सत्य जब अनुभव के स्तर पर उतरता है, तो वह मन को चुनौती देता है। लेकिन वही चुनौती आगे चलकर मुक्ति का द्वार बनती है।
इच्छापूर्ति दर्शन का उद्देश्य अंततः आपको यह अनुभव कराना है कि आप अपनी इच्छाओं के गुलाम नहीं हैं, बल्कि आप उनके सर्जक हैं। जब यह अनुभव जागता है, तभी वास्तविक स्वतंत्रता का जन्म होता है।
इच्छा से अनुभव तक की यात्रा ; मनुष्य ने कब पहली बार अपने भीतर कुछ हलचल महसूस की !
इस न्यूज़ पोर्टल अतुल्यलोकतंत्र न्यूज़ .कॉम का आरम्भ 2015 में हुआ था। इसके मुख्य संपादक पत्रकार दीपक शर्मा हैं ,उन्होंने अपने समाचार पत्र अतुल्यलोकतंत्र को भी 2016 फ़रवरी में आरम्भ किया था। भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से इस नाम को मान्यता जनवरी 2016 में ही मिल गई थी ।
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