UNSC में पहला झटका, कश्मीर पर 9 वोट भी नहीं जुटा सके पाकिस्तान-चीन

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New Delhi/Atulya Loktantra : कश्मीर मुद्दा पाकिस्तान के लिए गले की फांस बन गया है. उसे पता नहीं चल रहा कि आगे करना क्या है. विश्व बिरादरी के सामने उसने अनुच्छेद 370 का मुद्दा काफी उठाया लेकिन उसकी एक भी दलील नहीं टिकी. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के लगभग सभी देशों (चीन को छोड़कर) ने उसे बैरंग लौटा दिया. अब सिर्फ चीन बचा है जो उसकी फरियाद सुन रहा है, वह भी दबाव में क्योंकि चीन का बहुत कुछ पाकिस्तान में दांव पर लगा है.

संयुक्त राष्ट्र चीन के गिड़गिड़ाने पर कश्मीर मुद्दे पर शुक्रवार को बैठक करने जा रहा है. ऐसा कभी नहीं हुआ कि संयुक्त राष्ट्र जैसी मुखिया संस्था को बंद दरवाजे के पीछे बैठक करनी पड़े लेकिन पाकिस्तान के इशारे पर चीन जो न कराए. संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में यह दूसरा मौका है जब कश्मीर मुद्दे पर कोई बैठक होने जा रही है. हालांकि दूसरी बैठक 1971 की पहली बैठक से कई मायनों में भिन्न है. पहली बैठक न तो बंद दरवाजे के पीछे थी और न ही सुरक्षा परिषद् के अधिकांश सदस्य देशों ने पाकिस्तान का समर्थन करने से मना किया था. यूएनएससी में 1969-71 में ‘सिचुएशन इन द इंडिया/पाकिस्तान सबकॉन्टिनेंट’ विषय के तहत कश्मीर का मुद्दा उठाया गया था.

UNSC के इन देशों ने पाक को कहा ना
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् (यूएनएससी) में कुल 15 सदस्य हैं. इनमें 5 स्थाई और 10 अस्थाई हैं. अस्थाई सदस्यों का कार्यकाल कुछ वर्षों के लिए होता है जबकि स्थाई सदस्य हमेशा के लिए होते हैं. स्थाई सदस्यों में अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस शामिल हैं. अस्थाई देशों में बेल्जियम, कोट डीवोएर, डोमिनिक रिपब्लिक, इक्वेटोरियल गुएनी, जर्मनी, इंडोनेशिया, कुवैत, पेरू, पोलैंड और साउथ अफ्रीका जैसे देश हैं.

स्थाई सदस्यों में चीन को छोड़ दें तो बाकी के देशों-फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका ने पाकिस्तान को ठेंगा दिखा दिया है. इनका स्पष्ट कहना है कि कश्मीर मुद्दा हिंदुस्तान और पाकिस्तान का आंतरिक मसला है, इसलिए दोनों देश मिलकर निपटें, किसी तीसरे पक्ष की इसमें दरकार नहीं.

चीन की मजबूरी
ऐसा नहीं है कि चीन, पाकिस्तान का घनिष्ठ पड़ोसी है और वह अपने मित्र राष्ट्र के लिए कुछ भी कर सकता है. चीन के सामने बड़ी मजबूरी बेल्ट रोड इनीशिएटिव (बीआरओ) है जिसका बड़ा हिस्सा पाकिस्तान से होकर गुजर रहा है. सड़क निर्माण के इस बड़े प्रोजेक्ट में चीन ने बहुत कुछ झोंक दिया है. अरबों युआन की राशि उसने रोड प्रोजेक्ट में लगाई है और पाकिस्तान से यारी बनाए रखने के लिए वहां बड़ी मात्रा में निवेश किया है.

ऐसे में चीन के सामने दो ही विकल्प हैं. पहला यह कि वह पाकिस्तान को झिड़क दे और अपने बूते बीआरओ को आगे बढ़ाए. दूसरा विकल्प उसके सामने सबकुछ बर्दाश्त करते हुए पाकिस्तान को मदद देने का है. पाकिस्तान को चीन झिड़क नहीं सकता क्योंकि उसे पता है इससे उसका पैसा तो डूबेगा ही, रोड प्रोजेक्ट में जान-माल की भी बड़ी क्षति होगी.

गौर करने वाली बात यह है कि पाकिस्तानी आतंकी कई देशों में कोहराम मचा चुके हैं लेकिन अभी तक उन्होंने किसी चीनी नागरिक को नहीं छुआ है जो बीआरओ प्रोजेक्ट में लगे हैं. इसलिए चीन हर नफा-नुकसान देखते हुए पहले विकल्प में टिकना चाहता है. लिहाजा यूएनएससी की बैठक में वह पाकिस्तान की मदद कर रहा है.

अस्थाई सदस्यों से चीन को ठेंगा
कुल 10 अस्थाई देशों में पोलैंड अकेला राष्ट्र जो पाकिस्तान के साथ खड़ा दिख रहा है. हालांकि यह उसकी राजनयिक मजबूरी है. उसने भारत और पाकिस्तान के इस बखेड़े से खुद को काफी दूर रखा है लेकिन पोलैंड चूंकि इस वक्त यूएनएससी का रोटेटिंग प्रेसिडेंट है, इसलिए उसके सामने बैठक कराना ही अंतिम विकल्प है. इसका अर्थ यह कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि पोलैंड कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ है. वह किसी राष्ट्र के साथ नहीं है बल्कि अस्थाई देशों की ओर से बैठक की मेजबानी कर रहा है.

पोलैंड के अलावा बेल्जियम, कोट डीवोएर, डोमिनिक रिपब्लिक, इक्वेटोरियल गुएनी, जर्मनी, इंडोनेशिया, कुवैत, पेरू और साउथ अफ्रीका पाकिस्तान को पूरी तरह नकार चुके हैं. इन देशों से पाकिस्तान को धेले भर का समर्थन नहीं मिलने वाला. तभी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने विश्व बिरादरी के सामने दुखड़ा रोया कि गए तो सबकी दहलीज पर लेकिन भाव किसी ने नहीं दिया.

यूएनएससी देशों की वीटो प्रक्रिया
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में वीटो की प्रबल प्रक्रिया है. किसी भी एडॉप्शन (प्रस्ताव) को हरी झंडी मिलने या उसे नकारने में इसका रोल काफी अहम है. संयुक्त राष्ट्र चार्टर की ओर से तय शर्तों के तहत, सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के वीटो का अधिकार प्रतिबंधित है, अर्थात यह मुख्य रूप से सुरक्षा परिषद के कामकाज से संबंधित के मामलों में लागू नहीं होता है.

ऐसी स्थिति में, सुरक्षा परिषद को निर्णय लेने के लिए नौ सदस्यों के समर्थन की जरूरत होती है, भले ही वे सुरक्षा परिषद के स्थायी या गैर-स्थायी सदस्य हों. गैर-स्थायी सदस्यों की शक्तियां भी “वीटो के सामूहिक अधिकार” की तरह मजबूत होती हैं (यदि सुरक्षा परिषद के कम से कम सात गैर-स्थायी सदस्य किसी ए़डॉप्शन के खिलाफ वोट देते हैं, तो भी समर्थन नहीं मिलता है).

पाकिस्तान को जब इतने राष्ट्र नकार चुके हैं तो वह कश्मीर मुद्दे पर किस मुंह से खुलेआम बैठक करेगा. ऐसी स्थिति में संयुक्त राष्ट्र के सामने एक ही चारा है कि बैठक बंद दरवाजे के पीछे की जाए ताकि किसी देश की जगहंसाई होने से बच जाए.

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