पुरस्कारों की सरकारी नीति पक्षपातपूर्ण है

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केंद्र सरकार द्वारा जल संरक्षण हेतु दिए जाने वाले पुरस्कारों की नीति पक्षपातपूर्ण और पूरी तरह अनुचित व असंगत है। इसका क्या मापदण्ड है, यह समझ से परे है। यदि यह पुरस्कार दिये ही जाने हैं तो इस हेतु कार्य करने वाले व्यक्तियों के कार्य की एक निश्चित समय सीमा होनी चाहिए और उसका निर्धारण पर्यावरण के क्षेत्र के नामचीन व्यक्तियों की समिति के सुझावों, समिति द्वारा उस व्यक्ति द्वारा किए कार्य से प्राणी जगत कितना लाभान्वित हुआ है, जीव-जंतु की प्रजातियां कितनी लाभान्वित हुयी हैं, पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन में उसके कार्य द्वारा कितना योगदान है, और जनता में उसकी कितनी प्रतिष्ठा है, के आधार पर दिया जाना चाहिए।

ना कि किसी व्यक्ति विशेष को मात्र उपकृत करने के उद्देश्य से दिया जाना कहां तक न्यायसंगत है। यह पुरस्कार पूरी तरह उपकार का मामला प्रतीत होता है, इसके अलावा कुछ नहीं। इस तरह तो भविष्य में भी ऐसे राष्ट्रीय पुरस्कार दिये जाते रहेंगे और नामचीन व्यक्ति की सिफारिश पर राष्ट्रीय पुरस्कार की रेवड़ियां बाटी जाती रहेंगी। जल संरक्षण के क्षेत्र में यदि राष्ट्रीय पुरस्कार दिया जाना था तो उसके लिए सर्वथा उपयुक्त नाम अलीगढ़ के कासिमपुर निवासी श्री सुबोध नंदन शर्मा का था जिन्होंने बीते बाईस बरसों के संघर्ष के बाद शेखा झील को पुनर्जीवन देने का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया।

उनके इस महती कार्य के परिणाम स्वरूप हजारों प्रवासी पक्षी इस झील पर शरद काल में यहां आकर अपना डेरा डालते हैं। श्री सुबोध नंदन शर्मा का नाम पर्यावरण के क्षेत्र में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। उत्तर प्रदेश प्रशासन, उसके वरिष्ठ अधिकारी व जनता जनार्दन उनके पर्यावरण में किये अविस्मरणीय योगदान से भलीभांति परिचित हैं। ऐसे जुझारू, कर्मठ और पर्यावरण के कार्य में अपना सर्वस्व होम करने वाले व्यक्ति का इस पुरस्कार हेतु चयन न होना संदेह और षडयंत्र की आशंका को बल प्रदान करता है। इस तरह इन पुरस्कारों की महत्ता ही धूमिल होती प्रतीत होती है। सरकार के इस निर्णय से समूचे अलीगढ़ परिक्षेत्र और पर्यावरण प्रेमियों में रोष व्याप्त है।

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