डॉ. हेमलता शर्मा ✒
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत मतदाता का विवेक होता है, लेकिन जब यही विवेक भावनाओं की लहर में बह जाता है, तो लोकतंत्र केवल एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाता है। आज का मतदाता अक्सर मुद्दों, नीतियों और विकास की बजाय भावनाओं—धर्म, जाति, राष्ट्रवाद या व्यक्तिगत आकर्षण—के आधार पर अपना वोट तय करता है। यह प्रवृत्ति न केवल खतरनाक है, बल्कि देश के भविष्य के लिए भी घातक है।
राजनीति का स्तर तब गिरता है, जब नेता जानते हैं कि उन्हें काम नहीं, बल्कि भावनाएँ भड़काकर वोट मिल सकते हैं। ऐसे में चुनावी मंच विकास के वादों का नहीं, बल्कि भावनात्मक नारों का अखाड़ा बन जाता है। जनता के वास्तविक मुद्दे—रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई—पिछड़ जाते हैं और उनकी जगह ले लेते हैं खोखले वादे और भ्रामक प्रचार।
भावनात्मक मतदान का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इससे योग्य और ईमानदार नेतृत्व पीछे छूट जाता है। जनता उस व्यक्ति को चुन लेती है जो उनकी भावनाओं को छूता है, न कि उस व्यक्ति को जो उनके जीवन को बेहतर बना सकता है। परिणामस्वरूप, सत्ता ऐसे हाथों में चली जाती है जो जनता के प्रति जवाबदेह नहीं होते।
इसके अलावा, यह प्रवृत्ति समाज को भी बांटती है। जब वोट धर्म या जाति के आधार पर डाले जाते हैं, तो समाज में अविश्वास और विभाजन बढ़ता है। लोकतंत्र, जो एकता का प्रतीक होना चाहिए, वह विभाजन का कारण बन जाता है।
समस्या का समाधान केवल एक है—जागरूक मतदाता। जब तक जनता अपने अधिकार के साथ अपने कर्तव्य को नहीं समझेगी, तब तक यह सिलसिला चलता रहेगा। वोट केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि भविष्य तय करने की जिम्मेदारी है।
अंततः, यह सवाल हर मतदाता को खुद से पूछना होगा—
क्या मैं अपने वोट से देश बना रहा हूँ, या केवल अपनी भावनाओं को संतुष्ट कर रहा हूँ !!


