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जरूरी है थार के रेगिस्तान को रोकने वाली ढाल को बचाना

Deepak Sharma
Last updated: 2 January, 2026
By Deepak Sharma
255 Views
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12 Min Read
जरूरी है थार के रेगिस्तान को रोकने वाली ढाल को बचाना
जरूरी है थार के रेगिस्तान को रोकने वाली ढाल को बचाना
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अरावली नष्ट हुयी तो पीढ़ियां भुगतेंगी खामियाजा — मोहन भागवत

उत्तर भारत का सुरक्षा कवच है अरावली — ज्ञानेन्द्र रावत

ज्ञानेन्द्र रावत
ज्ञानेन्द्र रावत

आजकल अरावली का मुद्दा सर्वत्र चर्चा का विषय बना हुआ है। देश की सर्वोच्च अदालत ने अरावली की परिभाषा और सहायक मुद्दों के संबंध में बीते दिनों स्वत: संज्ञान लेते हुए अभी फिलहाल अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की नयी परिभाषा स्वीकार करने वाले अपने 20 नवम्बर के आदेश पर रोक लगा दी है और अपने आदेश में कहा है कि पिछले फैसले में निर्धारित निष्कर्षों और निर्देशों को स्थगित रखने की जरूरत है क्योंकि कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिनपर स्पष्टीकरण की जरूरत है। शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे की व्यापक और समग्र समीक्षा के लिए इस क्षेत्र के विशेषज्ञों को शामिल कर एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि क्या अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की परिभाषा ,जो विशेषकर दो या दो से अधिक पहाड़ियों के बीच 500 मीटर के क्षेत्र तक सीमित है, एक संरचनात्मक विरोधाभास पैदा करती है? इससे संरक्षित क्षेत्र का भौगौलिक दायरा संकुचित हो जाता है। क्या इस सीमांकन में गैर अरावली क्षेत्रों के दायरे को विस्तृत कर दिया है जिसके चलते अनियमित खनन और अन्य विघटनकारी गतिविधियों को जारी रखने में सुविधा हो रही है?क्या 100 मीटर और उससे ऊंची पहाड़ियां निर्धारित 500 मीटर की सीमा से अधिक की दूरी होने पर भी एक सन्निहित पारिस्थितिकीय संरचना का गठन करती हैं। व्यापक रूप से प्रचारित आलोचना कि राजस्थान की 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1048 पहाड़ियां ही 100 मीटर की ऊंचाई की सीमा को पूरा करती हैं, जिससे शेष निचली पहाड़ियों को पर्यावरण संरक्षण से वंचित कर दिया जा रहा है, क्या यह तथ्यात्मक और वैज्ञानिक रूप से सही है?

शीर्ष अदालत का यह भी मानना है कि पर्यावरणविदों ने नयी परिभाषा और कोर्ट के आदेश की गलत व्याख्या और अनुचित कार्यान्वयन की आशंका जताते हुए चिंता प्रकट की है। यह आशंका ,आलोचना या असहमति कोर्ट के निर्देशों में स्पष्टता की कमी से उत्पन्न हुयी है। इसलिए अरावली क्षेत्र की पारिस्थितिकीय अखंडता को कमजोर करने वाली किसी भी नियामकीय खामी को रोकने के लिए जांच और स्पष्टीकरण की बेहद जरूरत है। जाहिर है सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश स्वागत योग्य है। आगे क्या होगा लेकिन इतना तय है कि इसने 20 नवम्बर के आदेश से उपजे असंतोष और विरोधियों के स्वरों को राहत पहुंचाने का काम किया है। असलियत में देश के पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस नयी परिभाषा का कड़ा विरोध करते हुए आशंका जताई थी कि इससे पहाड़ियों में खनन, रियल स्टेट ओर अन्य परियोजनाओं के लिए रास्ता खोलकर उन्हें नुकसान पहुंचाने की एक सुनियोजित साजिश की जा रही है। यह भी कि अरावली क्षेत्र में खनन बढ़ाने की सोच भविष्य के लिए खतरनाक है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के 20 नवम्बर के फैसले के विरोध में देश में खासकर अरावली क्षेत्र के राज्यों में व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुए, जगह-जगह रैलियां हुयीं। यहां तक कि इसके विरोध में हुये प्रदर्शनों में आमजन के अलावा राजनैतिक दलों, स्कूल- कालेज के छात्रों और नौजवानों ने बढ़- चढ़कर भाग लिया है और वे बड़ी संख्या में आज भी “सेव अरावली” नामक अभियान बड़े जोर-शोर से चला रहे हैं। उनका मानना है कि उत्तर से पश्चिम तक फैली अरावली को तोड़ना भारत की विरासत को तोड़ने जैसा है। अगर अरावली ढाई तो सिर्फ पहाड़ ही नहीं ढहेंगे, पानी, खेती, हवा और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी खतरे में पड़ जायेगा। यह विकास नहीं,चेतावनी है कि अब भी नहीं संभले तो बहुत देर हो जायेगी।

असलियत में अरावली को लेकर हाल-फिलहाल में जो बावेला मचा हुआ है, वह उसके अस्तित्व को लेकर है जिसपर खतरा मंडरा रहा है। इसका एकमात्र कारण यह है कि अरावली मात्र हमारे लिए भूगोल का एक अध्याय नहीं है, वह पत्थरों का एक ढेर नहीं, चट्टानों की एक कतार नहीं, एक पहाड़ नहीं है, उस पर मरुधरा का पूरा अस्तित्व टिका हुआ है। वह रेगिस्तान से बचाने वाली प्राकृतिक ढाल है । अरावली के ऐतिहासिक और पर्यावरणीय महत्व को स्वीकारते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघ चालक मोहन भागवत का मानना है कि-” अरावली उत्तर भारत के पर्यावरण संतुलन की रीढ़ है। यदि अरावली को नष्ट किया तो इसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियां भुगतेंगीं। विकास जरूरी है लेकिन वह प्रकृति को साथ लेकर ही टिकाऊ हो सकता है। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बेहद जरूरी है। आज जरूरत इस बात की है कि ऐसी योजनायें बनायी जायें जिससे प्राकृतिक संसाधनों कोई नुकसान न हो और विकास भी होता रहे। उन्होंने इस बातपर बल दिया कि रोजगार, कैरियर और आधुनिक सुविधायें जरूरी हैं लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं। हम पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। “

दरअसल 670 किलोमीटर क्षेत्र में फैला उत्तर भारत का सुरक्षा कवच है जो हजारों सालों से थार रेगिस्तान को पूर्व की ओर विस्तार को रोकता है ताकि पूर्वके लोग खुली हवा में सांस ले सकें। यही नहीं वह दिल्ली, गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे शहरों के लिए एक विशाल एक्यूफायर के रूप में काम करता है। वह भूजल को संचित करती है, धूल भरी आंधियों और प्रदूषण से शहरों को बचाती है। इस क्षेत्र में 300 से भी ज्यादा पक्षी प्रजातियों के अलावा तेंदुए जैसे जंगली जानवरों का वास है। सुप्रीम कोर्ट ने भले 20 नवम्बर के फैसले को बदल कर एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाने की घोषणा की है जो इससे जुड़े मुद्दों पर गहन मंथन करेगी लेकिन अरावली बचाओ आंदोलनकारियों का मानना है कि सरकार की नीयत में ही खोट है। उसकी नजर में और सरकारी फाइलों में अरावली महज केवल टनों की तादाद में निकलने वाले पत्थर, बजरी और मार्बल तक ही सीमित है। उनके अनुसार विकास के पैरोकार जिन्होंने पहाड़ों को समतल कर दिया है, नदियों के मुहानों को सुखा दिया है, हजारों साल पुराने पारिस्थितिकीय तंत्र को कंक्रीट में बदलकर रख दिया है, वे पेड़-पौधों, जंगल, जमीन को निगलने को तैयार हैं, उन्होंने देवभूमि में चारधाम परियोजना,आल वैदर रोड और गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर हरे देवदार के हजारों-लाखों पेड़ों को नहीं छोड़ा, जो मध्य प्रदेश में प्रस्तावित नयी रेल लाइन के विस्तार हेतु 1.24 लाख पेड़ों की बलि देने को तैयार हों, तेलंगाना में हाइवे चौडी़करण के नाम पर हजारों पेड़ों को काट रहे हों, अंडमान निकोबार द्वीप में विकास परियोजना के नाम पर लगभग 130 वर्ग किलोमीटर के इलाके में 10 मिलियन पेड़ों की बलि दे रहे हों, झारखंड में कारो ओपन कास्ट परियोजना में 35,000 पेड़ों का बलिदान दे रहे हों, कर्नाटक के मंगलौर वन प्रभाग में विभिन्न सड़क परियोजनाओं हेतु पिछले एक साल में 1 लाख 39 हजार पेड़ काट दिये गये हैं, महाराष्ट्र के गढ़ चिरौली में जारी विभिन्न परियोजनाओं के चलते वहां के जंगल तेजी से सिमटते चले जा रहे हैं । नतीजतन वहां के जलस्रोत सूख गये हैं, वन्यजीव रिहायशी इलाकों की ओर रुख कर रहे हैं और लोगों के सामने आजीविका का संकट पैदा हो गया है, सिंगरौली में कोयले की भूख के चलते घिराली कोल ब्लाक के जंगल में बड़े पैमाने में पेड़ों की कटाई के मामले की हाई प्रोफाइल कमेटी जांच कर रही है, हंसदेव का नतीजा सामने है जहां अब सब साफ मैदान नजर आता है, इन हालात में हम कैसे यह दावा कर सकते हैं कि हमारा वन क्षेत्र बढ़ रहा है। हकीकत यह है कि अब जंगलों को पेड़ों की गिनती में बदल दिया गया है। इस साजिश के तहत लाखों पेड़, वन्यजीव और पर्यावरण संतुलन को खत्म किया जा रहा है। इसके चलते पर्यावरण विनाश की बहस तेज हो गयी है।

गौरतलब है कि जो बंदरगाह बेच रहे हों, हवाई अड्डे बेच रहे हों, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे बेच रहे हों, एक नहीं,जंगल के जंगल बेच रहे हों, जो राजस्थान के मरू क्षेत्र में जहां पिछले डेढ साल से जारी विरोध प्रदर्शन, धरने के बावजूद लाखों खेजड़ी के पेड़ों की सोलर ऊर्जा के लिए बलि देने को उतारू हों, ये तो मात्र उदाहरण हैं, जबकि ऐसा पूरे देश में हो रहा है, उन पर यदि अरावली नहीं रहेगी तो कोई असर नहीं पड़ेगा। इसमें दो राय नहीं कि पेड़ों की जड़ मिट्टी को बांधकर रखती हैं। उनके कटते ही मिट्टी बहने लगती है,उसकी उपजाऊ परत नष्ट हो जाती है और जमीन बंजर होने लगती है। असलियत यह है कि पेड़ों के कटते ही कार्बन सोखने की प्राकृतिक क्षमता काफी घट जाती है,नतीजा वातावरण में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा काफी बढ़ जाती है और तापमान बढ़ने लगता है। जलवायु परिवर्तन में तेजी इंसानों और जीव-जंतुओं के लिए खतरा बन जाती है।

आंदोलनकारियों का कहना है कि सरकार, मंत्री और कोर्ट कह रही है कि अरावली में खनन नहीं होगा और नये खनन के पट्टे जारी नहीं किये जायेंगे लेकिन अरावली में खनन निर्बाध गति से जारी है। राजस्थान का कोटपुतली जिला और हरियाणा का फरीदाबाद और भिवानी जिला तो अवैध खनन के मात्र उदाहरण हैं। यह समय कोर्ट के आदेश के मद्देनजर शांत होकर बैठ जाने का नहीं है। यह संघर्ष जारी रहेगा जब तक अरावली पर्वत माला में खनन पूरी तरह बंद न हो जाये। हम तब तक प्रकृति और अरावली की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ते रहेंगे। अरावली हमारी विरासत है, गर्व है। यह सोच तो हम लोगों का है, सरकार और कार्पोरेट जगत का नहीं। उनके लिए तो अरावली केवल जेब भरने का खजाना लगता है। इसीलिए आज यदि हमने अरावली बचाने की आवाज नहीं उठाई तो आने वाली पीढ़ियां हमसे पूछेंगीं कि जब तुम्हें अरावली बचा रही थी, तब तुम कहां थे और चुप क्यों बैठे थे?
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।)

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