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Home » प्रदूषण से लोगों की सांसत में जान: ज्ञानेन्द्र रावत
विचार

प्रदूषण से लोगों की सांसत में जान: ज्ञानेन्द्र रावत

Deepak Sharma
Last updated: 8 April, 2026
By Deepak Sharma
41 Views
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13 Min Read
Pollution is putting people's lives at risk: Gyanendra Rawat
Pollution is putting people's lives at risk: Gyanendra Rawat
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आज देश गंभीर वायु प्रदूषण के दौर से गुजर रहा है। इसका दुष्प्रभाव भयावह स्तर पर स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। वायु प्रदूषण प्रमुख पर्यावरणीय समस्याओं में से एक है जिसका प्राणी जगत पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। सच कहें तो वायु प्रदूषण के लिए मानवजनित स्रोत ही वे अहम तत्व हैं जो बाहरी तत्वों से मिलकर वायु की गुणवत्ता में कमी लाते हैं और जो मानव जाति और जीव-जंतुओं के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। इसी जानलेवा हवा में कार्बन डाई आक्साइड, कार्बन मोनो आक्साइड, सल्फर डाई आक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड, क्लोरीन, सीसा, अमोनिया, कैडमियम, धूल आदि मानवजनित वायु प्रदूषक तत्वों की अहम भूमिका होती है। हमारा देश दुनिया के प्रदूषित देशों की सूची में शामिल है। यहां हर साल तकरीबन 20 लाख से ज्यादा लोग प्रदूषित हवा के चलते मौत के मुंह में चले जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आज 93 फीसदी बच्चे प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। वायु प्रदूषण में सर्वाधिक योगदान जीवाश्म ईंधन और बायोमास के जलाने से होता है जो परिवहन, ऊर्जा उत्पादन, विनिर्माण और कृषि क्षेत्रों में होते हैं। इन गतिविधियों से निकलने वाली गैसें जैसे कार्बन मोनोक्साइड, कार्बन आक्साइड, नाइट्रोजन डाय आक्साइड तथा सूक्ष्म कण पार्टिकुलेट मैटर यानी पी एम वायुमंडल को प्रदूषित करते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो भारत जैसे देश में अधिकतर जनसंख्या राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों से ज्यादा प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर है। इसके पीछे देश में वायु गुणवत्ता निगरानी की समुचित व्यवस्था न होना है। हकीकत यह है कि देश में तकरीब 40 फीसदी से ज्यादा जिलों में वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशन ही नहीं हैं। वायु गुणवत्ता निगरानी की व्यवस्था न हो पाने के चलते देश में लोगों को समय रहते वायु की गुणवत्ता के बारे में विश्वसनीय, वास्तविक और स्तरीय जानकारी नहीं मिल पाती है। इसका खुलासा ‘ भारत में वायु गुणवत्ता डेटा की पहुंच, वितरण , अंतराल और नेटवर्क संम्बंध’, नामक अध्ययन जो एक विदेशी कंपनी ‘ एयरवाइस’ के द्वारा किया गया है। गौरतलब है यह कंपनी वायु गुणवत्ता की निगरानी और प्रबंधन के लिए समाधान विकसित करती है। इस अध्ययन में मैनुअल नेशनल एयर मानीटरिंग प्रोग्राम, कांन्टीन्यूअस एंबियंट एयर क्वालिटी मानीटरिंग नेटवर्क और सिस्टम आफ एयर क्वालिटी एण्ड वैदर फारकास्टिंग एण्ड रिसर्च को मिलाकर इन तीन मुख्य निगरानी प्रणालियों का विश्लेषण किया है। विश्लेषण से पता चलता है कि दिल्ली, मुंबई और बंगलुरू में सरकारी वायु निगरानी स्टेशन का घना निगरानी कवरेज है, कई मध्यम आकार वाले लाखों की तादाद वाले शहरों में केवल एक या दो स्टेशन हैं,या फिर हैं ही नहीं। कई ज्यादा आबादी वाले उ०प्र०, बिहार, पश्चिम बंगाल और आंध्रप्रदेश के जिलों में स्टेशन या तो खराब निगरानी में हैं या फिर वहां पूरी तरह से वास्तविक समय की निगरानी नेटवर्क से बाहर हैं। फिर सबसे बड़ी बात यह कि जहां स्टेशन हैं, वहां विश्वसनीयता सबसे बड़ा मुद्दा है और सबसे खराब प्रदूषित क्षेत्रों में कोई निगरानी स्टेशन है ही नहीं। ऐसी हालत में वायु गुणवत्ता निगरानी की आशा ही बेमानी है।

वैज्ञानिक विश्लेषणों से यह साबित हो चुका है कि कोयला और परिवहन उत्सर्जन के दो प्रमुख स्रोत हैं। ये दोनों वायु प्रदूषण के सबसे खतरनाक रूपों में बड़े भूभाग को प्रभावित करते हैं। यह भी कि वायु प्रदूषण से जुड़ी होने वाली स्वास्थ्य समस्यायें अक्सर एयरोसोल से जुड़ी होती हैं। एयरोसोल हवा में निलंबित सूक्ष्म ठोस या तरल लवण होते हैं जो अक्सर दिखाई नहीं देते। इनका निर्माण प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों स्रोतों से होता है। इनका आकार कुछ नैनोमीटर से लेकर कई माइक्रोमीटर तक हो सकता है। इसे कणों के आधार पर पी एम 2.5 आदि नामों से जाना जाता है। एयरोसोल में यह धुंआ, कोहरा और औद्योगिक प्रदूषण कण हैं। ये कण वायुमंडल में निलंबित धूल, समुद्री नमक, ज्वालामुखी की राख, धुंआ, पेड़ों से निकलने वाला रसायन और विभिन्न प्रकार के उत्सर्जन जैसे जीवाश्म ईंधन जलने यथा कारों और कारखानों से निकलने वाला प्रदूषण और औद्योगिक प्रदूषण आदि रूपों में पाया जाता है। यह जलवायु, मौसम और स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। एयरोसोल में मौजूद विषाक्त पदार्थ शरीर में विषाक्तता सम्बंधित प्रतिक्रियाओं को जन्म देते हैं। इसके चलते श्वसन सम्बंधी, लीवर,तंत्रिका तंत्र ,आंख और त्वचा की समस्या पैदा होती हैं। इसके लम्बे समय तक संपर्क में रहने से फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। इसके प्रभाव से पौधे और जानवर भी अछूते नहीं रह गये हैं। एयरोसोल के कण फेफड़ों में जलन पैदा कर सकते हैं और अत्याधिक सान्द्रता के कारण श्वसन तंत्र को अवरुद्ध भी कर सकते हैं। यहां तक कि यह मृत्यु का कारण भी बन सकते हैं। इसके सूक्ष्म कणों से होने वाले वायु प्रदूषण से हृदय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है। इस बारे में मेदांता में इंटरनल मेडिसिन रेस्पेरेटटी एण्ड स्लीप मेडिसिन के अध्यक्ष व एम्स दिल्ली के पूर्व निदेशक डा. रणदीप गुलेरिया कहते हैं कि वायु प्रदूषण आपके फेफड़े, दिल, दिमाग ही नहीं, पूरे शरीर को नुकसान पहुंचाता है। शरीर का कोई अंग ऐसा नहीं है जो इसके प्रभाव से अछूता हो। भारत में सभी श्वसन संबंधी मौतों में से एक तिहाई से अधिक वायु गुणवत्ता से जुड़ी हैं। इसके अलावा स्ट्रोक से होने वाली लगभग 40 फीसदी मौतों के लिए वायु प्रदूषण जिम्मेदार हैं। हालात की भयावहता का सबूत यह है कि देश की 70 फीसदी से ज्यादा आबादी रोजाना असुरक्षित हवा में सांस ले रही है। प्रदूषण का असर अब दमा, हृदय रोगों से भी कहीं आगे बढ़ गया है। अब यह कैंसर और मेटाबोलिक विकार को भी पार कर गया है। अब वातावरण में मानक से भी ढाई गुणा प्रदूषक कण मौजूद हैं। यह बेहद खतरनाक स्थिति है।

जहांतक देश की राजधानी दिल्ली का सवाल है तो दिल्ली वासियों की तो प्रदूषित जानलेवा हवा में सांस लेने की नियति ही है। विज्ञान एवं पर्यावरण केन्द्र की मानें तो दिल्ली में हानिकारक जहरीली गैसों यथा नाइट्रोजन डाय आक्साइड और कार्बन मोनोक्साइड का स्तर लगातार बढ़ रहा है। राजधानी के प्रदूषण में लगभग 51.5 फीसदी योगदान वाहनों के उत्सर्जन का है। इसके बाद आवासीय उत्सर्जन और दूसरे कारक जिम्मेदार हैं। राजधानी में मुख्य रूप में प्रदूषण वाहनों और दहन स्रोतों से हो रहा है। इस सम्बंध में सरकारी दावों की पोल दिल्ली की लोक लेखा समिति ने खोल दी है। समिति ने पिछले दिनों विधान सभा में पेश अपनी रिपोर्ट में प्रदूषण की निगरानी, सार्वजनिक परिवहन की बदहाली और उत्सर्जन मानकों को लागू करने में गंभीर प्रणालीगत कमियों को उजागर किया है। समिति ने तत्काल परिवहन और पर्यावरण विभागों को इन खामियों को दूर करने के लिए समयबद्ध सुधारात्मक कार्यवाही करने का निर्देश दिया है। यही नहीं विधान सभा में पेश आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में स्वीकार किया गया है कि प्रदूषण में सुधार के मामले में अभी बहुत लम्बा रास्ता तय करने की जरूरत है। क्योंकि अभी भी ढाई गुणा सुधार करने की आवश्यकता है तभी दिल्ली वाले साफ और सेहत वाली हवा में सांस ले सकेंगे। यह हालात की भयावहता का सबूत है। इस बाबत सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत व न्यायमूर्ति जायमाल्या बागची की आला पीठ ने सही ही कहा है कि वायु प्रदूषण की समस्या को अब सिर्फ सर्दियों की मुसीबत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। वायु प्रदूषण अब एक गंभीर समस्या का रूप ले चुका है। अब यह मामला बेहद गंभीर है।इसके फौरी निदान के बजाय दीर्घकालिक उपाय ढूंढना जरूरी हो गया है।

नेशनल इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजीज पटना का हालिया अध्ययन जो आक्सफोर्ड अकादमी ने प्रकाशित किया है, उसमें खुलासा हुआ है कि दिल्ली को बीते ढाई दशकों के दौरान हुए विकास कार्यों की कीमत पर्यावरण के भारी नुकसान के रूप में चुकानी पड़ी है। इससे मानव स्वास्थ्य यथा त्वचा, सांस ,फेफड़े सम्बंधित जानलेवा बीमारियों के साथ – साथ पारिस्थितिकीय तंत्र को भी बड़ा नुकसान हुआ है। यहां तक यमुना के बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र से लेकर घनी आबादी वाले इलाकों तक विकास की कीमत गंभीर प्रदूषण के रूप में चुकानी पड़ रही है। इससे जहां एक ओर यमुना की वाटर रिचार्ज क्षमता में 20 फीसदी से भी ज्यादा गिरावट आयी है, पौधारोपण के बाद उनके जीवित रहने की दर 30 फीसदी से भी अधिक कम हो गयी है, परिवहन योजनाओं जैसे मैट्रो के पास ध्वनि प्रदूषण का स्तर मानक यानी 55-65 से 15-20 डेसीबल अधिक हो गया है, मैट्रो कारिडोर में निर्माण के चलते हवा में पी एम 10 का स्तर 4 से 5 गुणा अधिक दर्ज किया गया, रिवर फ्रंट और पुल निर्माण के चलते जलीय जैव विविधता को सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है, लैंडफिल और अपशिष्ट प्रबंधन में नाकामी के चलते भूजल प्रदूषण उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है, वहीं दूसरी ओर लैंडफिल साइटों के पास के तकरीबन पांच किलोमीटर के क्षेत्रफल में रहने वाले लोग श्वसन तंत्र, फेफड़े, हृदय, त्वचा आदि जानलेवा बीमारियों के 40 फीसदी से भी ज्यादा शिकार हुए हैं। सबसे बड़ी बात यह कि पर्यावरण मंजूरी के बाद नियमों के पालन की दर बेहद खराब रही है। यही वह अहम वजह है जिसके चलते प्रदूषण की मार से दिल्ली हांफ रही है। इस अध्ययन की शोधकर्ता कृतिका की मानें तो दिल्ली कैरिंग कैपेसिटी यानी वहन क्षमता की सीमा लांघ चुकी है। इसके लिए केवल प्रोजेक्ट आधारित नहीं, बल्कि पूरी दिल्ली के लिए स्ट्रेटेजिक इनवायरमेंटल असेसमेंट की जरूरत है। कृतिका ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि तकनीकी पारदर्शिता नहीं बढ़ाई गयी तो 2030 तक दिल्ली का पारिस्थितिक तंत्र पूरी तरह ढह सकता है।

गौरतलब यह है कि राजधानी समेत देश के तमाम बड़े शहर प्रदूषण की बड़ी मार झेल रहे हैं। उस हालत में जबकि बरसों के इस बाबत प्रयास और करोड़ों-करोड की राशि स्वाहा होने के बाद भी राहत की कोई किरण दिखाई नहीं दे रही। यह समझ से परे है। ठीक गंगा-यमुना की निर्मलता के दावे की तरह, बीते चार दशक इसके जीते जागते सबूत हैं। जबकि शुद्ध हवा और शुद्ध पानी दोनों जीवन के अनिवार्य तत्व हैं। जाहिर है इनकी अनिवार्यता का कोई विकल्प नहीं है। इसके लिए संकीर्ण राजनीति और तंत्र की नाकामी जिम्मेदार है। यहां इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता कि आज जब दुनिया के कई शहर प्रदूषण मुक्त हो चुके हैं और वहां की नदियां प्रदूषण मुक्त होकर कलकल बह रही हैं, उस दशा में हम क्यों नाकाम हो रहे हैं। यह चिंतनीय तो है ही, विचार का भी विषय है।

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।)

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