भारतीय लोकतंत्र केवल एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं , बल्कि एक जीवंत संस्कृति है। वर्तमान समय में जब हम राष्ट्रीय एकीकरण, संस्कृति संरक्षण और संवर्धन की बात करते हैं तो हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती ‘विकास और विरासत’ के बीच संतुलन स्थापित करने की है ।
शिक्षा का गिरता स्तर और अतीत का गौरव –
इतिहास गवाह है कि तक्षशिला और गुरुकुल जैसे संस्थाएं केवल ज्ञान के केंद्र नहीं थी , बल्कि वह मानवीय संवेदनाओं और राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण की पाठशालाएं थी । आज जब हम यूजीसी के नीतिगत बदलाव को देखते हैं, तो प्रश्न उठता है कि क्या यह बदलाव छात्रों को केवल ‘डिग्री’ दे रहे हैं या उन्हें ‘आत्मनिर्भर’ बना रहे हैं ? विधायिका को इस दिशा में गंभीरता से विचार करना होगा कि उच्च शिक्षा में नीतिगत विषमता को कैसे दूर किया जाए।
विधायिका की चिंता और सामाजिक न्याय:-
विधायिका का प्रमुख दायित्व जनहित में समानता और संतुलन सुनिश्चित करना है। आरक्षण का मुद्दा केवल राजनीतिक समीकरण नहीं , बल्कि सामाजिक न्याय का एक संवैधानिक अधिकार है। वर्तमान समय में ज्वलंत मुद्दों पर विधायिका द्वारा उठाए गए नीतिगत कदम तभी सार्थक होंगे जब वह समाज के अंतिम व्यक्त की मानवीय आदर्श संवेदनाओं से जुड़ेंगे।
“न्यायपालिका की सक्रियता और विधायिका की दूरदर्शिता ही लोकतंत्र की वह ‘सशक्त मिसाल’ है , जो संवैधानिक अधिकारों को जनमानस तक पहुंचती है ।
कृषि में बदलाव औषधि पौधारोपण और रोजगार :
भारत की आत्मा गांव में बसती है। कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव केवल तकनीक से नहीं, बल्कि दृष्टिकोण से आएगा। औषधि गुना युक्त पौधों जैसे (तुलसी, अश्वगंधा , शतावरी ब्राह्मी) के रोपण पर जोड़ देना ना केवल हमारी आयुर्वेदिक संस्कृति का संरक्षण है बल्कि या रोजगार सृजन का एक बड़ा माध्यम भी है। शिक्षा को कृषि से जोड़ना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
संवैधानिक अधिकार और न्यायपालिका का आधार-
लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल आधार विधि का शासन है। न्यायपालिका ने समय-समय पर अपने निर्णयों से सिद्ध किया है कि जनहित सर्वोपरि है। जब विधायिका और कार्यपालिका के बीच समन्वय में स्थापित होता है, तभी राष्ट्रीय एकीकरण का मार्ग प्रशस्त होता है ।
निष्कर्ष : एक सशक्त भारत के लिए हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों (तक्षशिला /गुरुकुल) की और लौटना होगा और आधुनिक संवैधानिक अधिकारों के साथ कदम मिलाना होगा। शिक्षा स्वास्थ्य और रोजगार को राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर मानवीय संवेदनाओं के साथ जोड़ना ही सच्चे देश सेवा है।
शिक्षा यूजीसी के नियमों में तक्षशिला जैसी स्वायत्तता और गोकुल जैसी नैतिकता का समावेश।
सामाजिक न्याय-आरक्षण और समानता के बीच एक संवेदनशील संतुलन।
कृषि -औषधि पौधों की खेती के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सशक्तिकरण


