•कृष्ण कुमार पाठक ✒
शिक्षा की पावन गंगा से, बदलेगा यह परिवेश नया,
विश्वविद्यालय के प्रांगण में, उपजेगा एक संकल्प नया।
यूजीसी की गतिविधियों में, जनमानस का विश्वास जगे,
बौद्धिक ऊर्जा के संगम से, सोता हुआ यह राष्ट्र जगे।
जटिल कानून की मर्यादा, जब न्याय-नीति को अपनाए,
लोकतांत्रिक इस ढाँचे में, संवैधानिक अधिकार मुस्काए।
संरक्षण और संवर्धन हो, अधिकारों का हर एक द्वार,
सशक्त बने संप्रभु राष्ट्र, यह जन-जन का हो विचार।
राष्ट्रीय एकीकरण का स्वर, संस्कृति की पहचान बने,
विरासत के उन मूल्यों से, भारत का उत्थान बने।
शिक्षण की शुचिता जीवित हो, विधायिका भी चिंतन करे,
जनमानस के हर हृदय में, राष्ट्र-भक्ति का भाव भरे।
मातृभाषा के रत्नों से, सजता अपना यह देश रहे,
अंधकार सब छँट जाए, बस ज्ञान का ही संदेश रहे।
लोकतंत्र की नींव सुरक्षित, भविष्य का पथ उज्ज्वल हो,
राष्ट्र-धर्म ही प्रथम हमारा, हर कर्म यहाँ अब मंगल हो।


