डॉ. हेमलता शर्मा •
आज का मनुष्य एक ऐसे दौर में जी रहा है जहाँ समय की रफ्तार पहले से कहीं अधिक तेज हो चुकी है। इंटरनेट और स्मार्टफोन ने जीवन के लगभग हर क्षेत्र को बदल दिया है। शिक्षा, बैंकिंग, मनोरंजन और अब खरीदारी भी डिजिटल माध्यम से होने लगी है। कुछ क्लिक करते ही मनचाहा सामान घर के दरवाजे तक पहुँच जाता है। इसे आधुनिक जीवन की सुविधा कहा जाता है, लेकिन इस सुविधा के साथ कई गंभीर प्रश्न भी जुड़े हुए हैं।
ऑनलाइन खरीदारी ने निश्चित रूप से लोगों के जीवन को आसान बनाया है।
व्यस्त जीवन में बाजार जाने का समय बचता है। ग्राहक एक ही जगह पर कई कंपनियों के उत्पाद देख सकता है और उनकी कीमतों की तुलना कर सकता है। कई बार ऑनलाइन प्लेटफॉर्म आकर्षक छूट और ऑफर देकर ग्राहकों को सस्ता सामान उपलब्ध कराते हैं। यह व्यवस्था विशेष रूप से उन लोगों के लिए उपयोगी है जो बड़े शहरों की भागदौड़ में समय की कमी से जूझ रहे हैं।
लेकिन इस सुविधा की चमक के पीछे एक अलग सच्चाई भी छिपी हुई है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर दिखने वाली तस्वीरें और विज्ञापन अक्सर वास्तविकता से अलग एवं लुभावने होते हैं। ग्राहक को जो वस्तु दिखाई जाती है, वह कई बार वैसी नहीं होती। नकली या खराब गुणवत्ता वाले उत्पाद मिलना आज एक आम शिकायत बन चुकी है। ग्राहक को रिटर्न और रिफंड की जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जिससे उसका विश्वास कमजोर होता है।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा प्रभाव स्थानीय बाजारों और छोटे व्यापारियों पर पड़ रहा है। छोटे दुकानदार वर्षों से अपने ग्राहकों के साथ विश्वास का संबंध बनाकर व्यापार करते आए हैं। लेकिन जब ग्राहक बड़ी ऑनलाइन कंपनियों की ओर आकर्षित होने लगते हैं, तो इन दुकानों की बिक्री घटने लगती है। परिणामस्वरूप हजारों छोटे व्यापारियों और उनके परिवारों की आजीविका पर संकट खड़ा हो जाता है।
ऑनलाइन खरीदारी ने एक और नई समस्या को जन्म दिया है—उपभोक्तावाद। लगातार आने वाले विज्ञापन, सेल और छूट लोगों को बार-बार खरीदारी करने के लिए प्रेरित करते हैं। लोग जरूरत से ज्यादा सामान खरीदने लगते हैं। धीरे-धीरे खरीदारी एक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक आदत बन जाती है। यह आदत आर्थिक और मानसिक दोनों दृष्टि से नुकसानदायक हो सकती है।
इसके साथ ही पारंपरिक बाजारों की सामाजिक भूमिका भी कमजोर हो रही है। पहले बाजार केवल व्यापार का स्थान नहीं था, बल्कि वह सामाजिक संवाद का केंद्र भी होता था। दुकानदार और ग्राहक के बीच एक मानवीय संबंध बनता था। लेकिन ऑनलाइन खरीदारी में यह संबंध समाप्त हो जाता है और व्यापार केवल एक डिजिटल लेन-देन बनकर रह जाता है।
हालाँकि यह भी सच है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म ने कई नए अवसर भी प्रदान किए हैं। छोटे उद्यमियों और कारीगरों को अपने उत्पाद दूर-दूर तक पहुँचाने का अवसर मिला है। घर से काम करने वाले लोग, विशेषकर महिलाएँ और युवा, ऑनलाइन माध्यम से अपने उत्पाद बेचकर आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं।
इसलिए ऑनलाइन खरीदारी को पूरी तरह सही या पूरी तरह गलत कहना उचित नहीं होगा। यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें सुविधा और चुनौती दोनों मौजूद हैं। आवश्यकता इस बात की है कि उपभोक्ता विवेक और संतुलन के साथ इसका उपयोग करें। तकनीक का उद्देश्य मनुष्य के जीवन को सरल बनाना है, न कि उसे उपभोक्तावाद के जाल में फँसाना।
अंततः समाज को यह समझना होगा कि आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बनाए रखना ही सबसे बड़ा समाधान है। यदि हम डिजिटल सुविधाओं का उपयोग करते हुए स्थानीय बाजारों और छोटे व्यापारियों को भी महत्व दें, तो ही एक स्वस्थ और संतुलित आर्थिक व्यवस्था कायम रह सकती है l
( लेखिका समाज शास्त्री एवं अतुल्य लोकतंत्र की संपादकीय बोर्ड की सलाहकार हैं )


