
समूची दुनिया में बढ़ती गर्मी का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है।साल 2050 तक खतरनाक स्तर पर भीषण गर्मी का सामना करने को दुनिया के लगभग 41 फीसदी यानी 3.5 अरब लोग विवश होंगे। जबकि साल 2010 तक यह आंकड़ा महज 23 फीसदी ही था।यह स्थिति तब होगी जबकि दुनिया का औसत तापमान औद्योगिक युग से दो डिग्री सेल्सियस बढ़ जायेगा। आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के हालिया अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ है। अध्ययन के मुताबिक भारत, नाइजीरिया, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश और फिलीपींस इससे सर्वाधिक प्रभावित होंगे। वहीं ब्राजील और दक्षिणी सूडान जैसे देशों में तापमान में सबसे तेज उछाल आने की आशंका है। एशिया प्रशांत डिजास्टर रिपोर्ट 2025 के अनुसार फिजी, पापुआ न्यू गिनी और मार्शल जैसे कई द्वीपीय देशों में भी भविष्य में गर्मी का खतरा मध्यम से उच्च स्तर तक बढ़ सकता है। सच तो यह है कि भीषण गर्मी से स्वास्थ्य खतरा जैसे अंग विफलता कहें या विकलांगता, चक्कर , सिरदर्द आदि अन्य बीमारियों के साथ मौत भी हो सकती है। साथ ही शिक्षा, खेती, उत्पादकता,जीवन और विस्थापन पर भी अभूतपूर्व खतरा मंडरा रहा है। वैज्ञानिकों ने इसे ‘साइलेंट किलर’ की संज्ञा दी है जो स्वास्थ्य को चुपचाप नुकसान पहुंचाती है।2026 की शुरुआत में ही भीषण गर्मी, सूखे और आग की घटनाओं ने चेतावनी दे दी है। जानकारों का मानना है कि यह अध्ययन भारत जैसे विकासशील देशों के लिए एक गंभीर चेतावनी है जहां गर्मी केवल मौसम नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक गंभीर स्वास्थ्य संकट बनती जा रही है। उस स्थिति में तो यह और खतरे की घंटी है जबकि भारत की विशाल आबादी और पहले से ही गर्म जलवायु इसे और बेहद संवेदनशील बनाती है। इसका मुख्य कारण 1950 के बाद से लू या हीटवेव की आवृत्ति और तीव्रता में बढ़ोतरी, कमजोर बुनियादी ढांचे के कारण इन देशों में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों का भीषण गर्मी और स्वास्थ्य जोखिमों के प्रति अधिक संवेदनशील होना रहा है। इंटरनेशनल लेबर आर्गनाइजेशन के अनुसार भारत में गर्मी के कारण उत्पादकता में भारी कमी आयेगी और 4.5 फीसदी तक जी डी पी प्रभावित होने की आशंका है। वैज्ञानिकों ने तो अमेरिका, चीन और भारत में 23 से 30 अतिरिक्त दिन गर्म होने की संभावना व्यक्त की है।
भारत ही नहीं दुनिया के कई विकासशील देश भीषण गर्मी की मार से त्रस्त हैं। जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के चलते देश अत्याधिक गर्मी का सामना करने को विवश है। हालात गवाह हैं और दुनिया के शोध – अध्ययनों ने यह साबित कर दिया है कि भीषण गर्मी की मार से तपने वाले देशों की सूची में भारत सबसे ऊपर है और देश के अधिकांश यानी आधे से अधिक जिलों पर भीषण गर्मी का साया मंडरा रहा है। कहने का तात्पर्य यह है कि देश की तकरीब 76 फीसदी आबादी इसकी चपेट में है। यह निष्कर्ष ‘नेचर सस्टेनेबिलिटी’ जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट और ‘ हाऊ एक्सट्रीम हीट इज इंपैक्टिंग इंडिया : असेसमेंट डिस्ट्रिक्ट लेवल हीट रिस्क – 2025’ के नाम से काउंसिल आन एनर्जी एनवायरनमेंट एण्ड वाटर ( सी ई ई डब्ल्यू ) के अध्ययन में सामने आया है। अध्ययन रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक और डरावना पहलू यह है कि सबसे गर्म रातों यानी ‘हाट नाइट्स’ की तादाद में होने वाली बढ़ोतरी है। इससे हृदय रोग और उससे जुड़ी बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। इसका अहम कारण रात के तापमान का सामान्य से अधिक यानी काफी ऊपर रहने की वजह से इंसानी शरीर को पूरे दिन की थकान से उबर पाने का समय नहीं मिल पाना है। इससे हीट स्ट्रोक और हृदयाघात की संभावना ज्यादा रहती है। वैज्ञानिकों के अनुसार गर्मी का यह असर 1.5 डिग्री की सीमा पार करने से पहले ही दिखने लगेगा। और तो और अगले 5 सालों में ही लाखों घरों और दफ्तरों को कूलिंग सिस्टम की जरूरत में भी बेतहाशा बढ़ोतरी होगी। इसके परिणामस्वरूप जहां ऊर्जा की मांग में बेतहाशा बढ़ोतरी होगी, वहीं कार्बन उत्सर्जन में भी काफी इजाफा होगा।
गौरतलब है और विचारणीय भी कि आज हम गर्मी के भयावह रूप की चर्चा करते समय पर्यावरण में वृक्षों की महत्ता को क्यों नकार रहे हैं। यह समझ से परे है। जबकि गर्मी से बचाने में वृक्षों का महत्वपूर्ण योगदान जगजाहिर है। लेकिन दुख इस बात का है कि आज हम विकास के मोहपाश में पूरे देश में कहीं सड़क के नामपर, कहीं पर्यटन, कहीं रेल लाइन विस्तार,कहीं पन बिजली आदि-आदि विभिन्न योजनाओं के नामपर हर साल लाखों हरे-भरे पेड़ों की बलि दे रहे हैं। यह सिलसिला पूरे देश में जनविरोध के बावजूद बेरोकटोक जारी है और सरकार मौन है। राजस्थान में ग्रीन एनर्जी के नामपर हजारों- लाखों की तादाद में खेजड़ी के पेड़ों को काटा जा रहा है। वहां बीकानेर के नोखा दइया में 18 जुलाई 2024 और बीकानेर कलक्ट्रेट पर 18 जुलाई 2025 से किसान धरने पर हैं। बीती दो फरवरी से महापड़ाव में लाखों की मौजूदगी और तकरीब दस हजार महिलाओं का खेजड़ी को लेकर कलश प्रदर्शन इस मामले में भारी जन विरोध का प्रतीक है। इस बारे में महाराजा गंगा सिंह विश्व विद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डा० अनिल कुमार छंगाणी की मानें तो खेजड़ी की कटाई का दुष्परिणाम स्वरूप इस अंचल में तापमान 7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है। हमने नवम्बर महीने तक एसी और पंखे चलाये हैं। सर्दियां देखने को भी नहीं मिली हैं। यदि खेजड़ी का कटान ऐसे ही चलता रहा तो आने वाले सालों में गर्मी की भयावह तस्वीर देखने को मिलेगी और आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगीं। अब सवाल यह उठता है कि ऐसी स्थिति में तो हम गर्मी से तपेंगे ही, झुलसेंगे ही, बीमार होकर अनचाहे मौत के मुंह में जायेंगे ही। इसके लिए जिम्मेदार कौन है? देश के भाग्य विधाता मौन हैं। उन्हैं न पर्यावरण की चिंता है, न जीने और सांस लेने लायक शुद्ध हवा की और न देश की जनता की जिसके बल पर वह सत्तासीन हैं।
यदि हालात का जायजा लें और सी ई ई डब्ल्यू की मानें तो देश में गर्मी के सर्वाधिक जोखिम वाले राज्यों में दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, गोवा, केरल, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु ये 10 राज्य हैं। देश में गर्मी के 417 जिले उच्च जोखिम की श्रेणी में हैं जबकि 201 जिले मध्यम जोखिम का सामना कर रहे हैं। हालात यह है कि अब उत्तर भारत के शुष्क माने जाने वाले जिलों में देश के तटीय इलाकों में रहने वाली उमस देखी जा रही है और सिंधु और गांगेय के मैदानी क्षेत्र में बीते एक दशक के सापेक्ष में आद्रता में 10 फीसदी की बढ़ोतरी हुयी है। जबकि उत्तर भारत के देश की राजधानी दिल्ली सहित कानपुर, वाराणसी, जयपुर जैसे शहरों में तो आद्रता के स्तर का यह आंकड़ा 30 से 40 फीसदी से बढ़कर 40-50 फीसदी तक पहुंच गया है। इसका सबसे खतरनाक और चिंतनीय पहलू यह है कि बढ़ती गर्मी के जोखिम के चंगुल में शहर ही नहीं हैं, देश के उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और देश के दक्षिणी राज्य केरल के ग्रामीण जिले भी हैं। इससे सबसे ज्यादा प्रभावित खुले आसमान के नीचे काम करने वाले खेतिहर मजदूर होते हैं। इस बारे में यू एन ई एस सी ए पी का कहना है कि खेतिहर मजदूरों में हीट स्ट्रेस, डिहाइड्रेशन, गर्मी से जुड़ी बीमारियां अधिक होती हैं। क्योंकि छाया, पीने का पानी और आराम के क्षणों की कमी स्थिति को और विषम बना देती है। खासकर प्रवासी और असंगठित मजदूरों के मामले में पहचान का संकट एक अहम कारण है और यह भी कि उन्हें समय पर पर्याप्त इलाज नहीं मिल पाता है।
अब तो अल्ट्रावायलेट रेडिएशन का एक नया संकट सामने आ खड़ा हुआ है। दक्षिण भारत में बंगलूरू में इसमें हो रही बढ़ोतरी ने चिंता बढ़ा दी है। यहां अभी तापमान 32 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया है। यहां अल्ट्रावायलेट रेडिएशन में 10 से 13 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी दर्ज की गयी है। मौसम विभाग के अधिकारी अल्ट्रावायलेट रेडिएशन में बढ़ोतरी पर चिंता जाहिर करते हुए कहते हैं कि इस स्थिति को देखते हुए केरल के कई जिलों में स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथारिटी ने अलर्ट जारी किया है। इसके चलते सनबर्न, त्वचा संबंधी बीमारियां,आंखों में जलन और आंखों की अन्य बीमारियां तथा दूसरी स्वास्थ्य संबंधी समस्यायें पैदा होने की आशंका जतायी जा रही हैं। इसके कारण चेंगन्नूर, मुन्नार, पठानमथिट्टा, कोट्टाकारा, चंगनास्सेरी, ओल्लूर, पट्टानमिथिट्टा, अलपुझा,कोन्नी, थ्रीथला, मनंतावडी,कोझीकोड और पलक्कड जिलों में अल्ट्रावायलेट रेडिएशन में बढ़ोतरी का इंडेक्स बढ़कर 7 – 8 तक पहुंच गया है। मौसम विभाग का कहना है कि अभी यह हालत है तो गर्मी के मौसम में आगे क्या होगा। चिंता की असली वजह तो यही है।
संयुक्त राष्ट्र संगठन ने जोर दिया है कि बढ़ती गर्मी से सुरक्षित बनाने के लिए तुरंत ठोस कदम उठाने की जरूरत है। इसके लिए मौसम व जलवायु जोखिम की अधिक सटीक जानकारी को निर्णय प्रणाली और अर्ली वार्निंग सिस्टम में शामिल करना होगा। साथ ही विभिन्न क्षेत्रों के बीच बेहतर योजना और इस दिशा में सार्वजनिक निवेश को भी बढ़ावा देना बेहद जरूरी है। यह महज एक चुनौती नहीं, भविष्य की सुरक्षा का सवाल भी है। बढ़ती गर्मी अब सिर्फ मौसम की समस्या नहीं, बल्कि यह एशिया प्रशांत की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका का सीधा संकट बनती जा रही है। भारत और उच्च जोखिम वाले देशों के लिए यह चेतावनी है कि कृषि प्रणाली को बदलना और गर्मी के अनुकूल बनाना आज अनिवार्य हो गया है।


