
आज प्रकृति की अनदेखी के चलते धरती का असंतुलन एक खतरनाक मोड़ पर आ पहुंचा है। बढ़ती आबादी, नित नयी-नयी वैज्ञानिक सोच, असंतुलित विकास, सुख-सुविधाओं की चाहत की अंधी दौड़ और हमारी स्वार्थ परक सोच ने धरती को विनाश के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। इसका दुष्परिणाम प्रकृति प्रदत्त संसाधनों पर अत्याधिक दबाव और जीव-जंतुओं- वनस्पतियों की हजारों-हजार प्रजातियां की विलुप्ति के रूप में सामने आया है। जबकि जीव-जंतुओं की धरती के संतुलन में अहम भूमिका है। इनमें होने वाला कोई भी बदलाव धरती पर सीधा असर डालता है। भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है लेकिन हालिया आंकड़े सबूत हैं कि यहां की उपजाऊ जमीन लगातार घट रही है। सी एस ई की रिपोर्ट के अनुसार देश के 26 राज्यों में 96.4 फीसदी जमीन बंजर हो चुकी है। आईपीसीसी की रिपोर्ट कहती है कि भारत में पहले ही से 30 फीसदी जमीन खेती के अयोग्य है और अब जलवायु परिवर्तन के चलते 40 फीसदी जमीन पर बंजर होने का खतरा मंडरा रहा है। इसके पीछे पानी और वनों का कटान, हवा और मिट्टी की विशेषताओं और बारिश के पैटर्न में बदलाव, बारिश कम होना, वनस्पति का लगातार खत्म होना, जल भराव, पाला पड़ने, पानी में खारापन बढ़ना और खुदाई व शहरीकरण आदि अहम कारण हैं। इसके बावजूद हम धरती जो हम सबका घर है और इसे हम सब मां के रूप में पूजते हैं, की बेहतरी की बाबत नहीं सोच रहे हैं। विडम्बना यह है कि इस दिशा में जो प्रयास किये भी जा रहे हैं, वे चाहे जलवायु परिवर्तन रोकने के हों, तापमान 1.5 डिग्री तक सीमित करने के हों, वे नाकाफी हैं। क्योंकि इसके लिए मीलों लम्बा फासला तय करना है जो हकीकत में आसान नहीं है। हम यह कदापि नहीं सोच रहे कि हम अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर धरती को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं जिसकी भरपाई असंभव है। जबकि यह सर्वविदित है कि बिगड़ती हवा-पानी-मिट्टी और पारिस्थितिक तंत्र में होने वाली नकारात्मक हलचल धरती के असंतुलन का अहम कारण है।
गौरतलब है कि संपूर्ण प्राणी जगत इसी धरती के अंग हैं। यही धरती हम सबको अपने में समाये हुए है। यही धरती का धर्म है। विचारणीय है कि धरती तो अपना धर्म बखूबी निबाह रही है लेकिन क्या हम भी अपना धर्म निबाह रहे हैं। जबकि इसी धरती में रत्न गर्भा अकूत खनिज संपदा है, उसी के पेट में असंख्य वनस्पतियां हैं, उसी पर असंख्य जीव-जंतुओं-पक्षियों का वास है। जैन मत की मानें तो उनमें पृथ्वीकाय, अपकाय, तेजसकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय और त्रसकाय कुल छह प्रकार के जीव हैं। पृथ्वी भी एक जीव ही है। मिट्टी से लेकर हीरा-पन्ना-सोना-कोयला आदि-आदि सभी जीव हैं। मान्यता है कि मिट्टी के एक छोटे से कण में भी असंख्य जीवों का वास है। पृथ्वीकाय की भांति ही शेष पांच प्रकार के जीव-निकाय भी जीवंत हैं जिनकी अपनी स्वतंत्र सत्ता है। कहा भी गया है और अहिंसा में विश्वास रखने वालों के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे सभी जीव-निकायों को भली-भांति समझें और उनकी यथा संभव रक्षा करें। लेकिन इस धरती का सबसे शक्तिशाली जीव मनुष्य ही इस धरती को अपने अंतहीन लोभ-लालच के चलते सबसे अधिक नुकसान पहुंचा रहा है।
हमारी धरती तकरीबन साढ़े चार अरब साल पुरानी है। शुरूआती सालों के अध्ययन से साफ है कि उस दौरान हुए बदलावों का सिलसिला क्रमिक रूप से जारी रहा है। उनमें महाद्वीपों के खिसकने,बर्फ की परतों के कमजोर होने, कुछ प्रजातियों की उत्पत्ति, कुछ के विकास और कुछ के हमेशा के लिए विलुप्त होने का यह सिलसिला क्रमश: धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा है। लेकिन बीते कुछेक दशकों में जो बदलाव देखने को मिला, उसने समूची दुनिया को हैरत में डाल दिया है। इस बारे में चिंतित भूवैज्ञानिकों-पर्यावरणविदों का स्पष्ट मत है कि बीते दशकों में धरती में आये बदलावों को देखते हुए इस बारे में हमें गंभीरतापूर्वक सोचना होगा। दरअसल ग्यारह हजार साल पहले हिमयुग के खात्मे के बाद से ही मानव सभ्यता का विकास शुरू हुआ है। यह काल होलोसीन कहा जाता है जो अब खत्म हो चुका है। आज जिस युग में हम जी रहे हैं, इसको हम मानव निर्मित युग भी कह सकते हैं। इसे एन्थ्रोपोसीन के नाम से भी जानते हैं। जाहिर है इस युग में धरती पर हुए किसी भी बदलाव को देख पाना किसी के लिए भी असंभव नहीं रह गया है।
बीते हजारों सालों में वह चाहे खेती हो, हरियाली के तौर-तरीकों में आया बदलाव हों, कंक्रीट और लोहे से किये जाने वाले निर्माण हों, समय के साथ-साथ अनुसंधान के तहत हुए वैज्ञानिक बदलाव हों, रासायनिक बदलाव हों, अंतरिक्ष, ग्रहों की खोज के तहत अनुसंधान के उपरांत हुए राकेट यान के प्रक्षेपण रूपी बदलाव हों, अंतरिक्ष में भेजे उपग्रहों, चंद्रयान व मंगलयान आदि खोजी उपग्रहों रूपी बदलाव हों, औद्योगिक, मानवीय जीवन शैली में आये बदलावों ने काफी कुछ हदतक बदलाव डाला है। इससे समस्याओं में विस्तार होना स्वाभाविक था। आबादी का बदलाव, उसमें बेतहाशा बढ़ोतरी, उसके चलते संसाधनों की दिनोंदिन होती अपर्याप्तता और वातावरण में प्रदूषण की समस्या को गंभीर स्थिति तक गहराने का काम किया है। यहां तक कि हमारा सामाजिक ढांचा और रहन-सहन भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। आशंका है कि इस सदी के आखिर तक आबादी का आंकड़ा दुनिया में नौ अरब से भी ज्यादा पार कर जायेगा। बढ़ते शहरीकरण का नतीजा यह होगा कि दुनियाभर में लागोस, साओ-पाउलो, टोक्यो और दिल्ली जैसे अनेकानेक महानगर बनेंगे जिसका असर धरती और पर्यावरण पर तो पड़ेगा ही। इस सच्चाई को दरगुजर नहीं किया जा सकता।
दुनियाभर के शोध-अध्ययन चेतावनी दे रहे हैं कि यदि वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी इसी तरह जारी रही तो 2050 के बाद दुनिया में भयंकर तूफान आयेंगे जो 2005 में दक्षिण अमेरिका में भीषण तबाही मचाने वाले कैटरीना से भी ज्यादा भयावह होंगे। नागोया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने अनुसंधान के बाद चेताया है कि समुद्र के तापमान में बढ़ोतरी से तूफान स्वाभाविक रूप से भयंकर हो उठते हैं। वे अपने साथ समुद्र की ऊर्जा को भी साथ ले लेते हैं जिससे भारी वर्षा होती है जो तबाही का कारण बनती है। इसकी अहम वजह यह है कि वैश्विक तापमान के कारण हवा में जल वाष्प बन जाता है। दुनिया के शोध-अध्ययन से खुलासा हो चुका है कि प्राकृतिक संसाधनों के बेतहाशा उपयोग और भौतिक सुख-संसाधनों की चाहत में बढ़ोतरी के चलते हो रहे अंधाधुंध प्रदूषण से जलवायु में बदलाव आने से धरती तप रही है। इससे वैश्विक तापमान में अनुमान से दोगुणी बढोतरी हो सकती है। ईकोसिस्टम में बदलाव से जंगल आग के चलते खत्म हो जायेंगे। घास के मैदान सहारा रेगिस्तान में तब्दील हो सकते हैं। बर्न यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक प्रोफेसर हबेस्टस फिशर का कहना है कि पूर्व में गर्मी का अध्ययन दर्शाता है कि गर्मी बढ़ने की संभावना ज्यादा है और दो डिग्री का लक्ष्य अनुमान की तुलना से कहीं अधिक छोटा है। अगर इस दीर्घकालिक लक्ष्य को हासिल भी कर लेते हैं तो भी समुद्र का जलस्तर छह मीटर तक बढ़ सकता है। अंटार्कटिका की बर्फ 2012 की तुलना में तीन गुणा तेजी से पिघल रही है। वहां हर साल 21,400 टन से ज्यादा की दर से बर्फ पिघल रही है। जलवायु परिवर्तन और धरती के बढ़ते तापमान के लिए कोई और प्राकृतिक कारण नहीं,बल्कि मानवीय गतिविधियां ही जिम्मेदार हैं। यह सब जानते-समझते हुए भी धरती के संसाधनों का क्षय व क्षरण अनवरत जारी है। अब तो धरती तो धरती दुनिया में आगरा का ताजमहल, गुजरात का प्राचीन बंदरगाह वाला शहर धौलावीरा, उड़़ीसा का तटीय पुरी का मंदिर, जैसलमेर का किला और अजंता-ऐलोरा की विश्व प्रसिद्ध गुफाओं सहित ईराक का जिगुरात मंदिर, ईरान की इस्फहान की मस्जिदें, चीन की विशालकाय दीवार और ईस्टर आईलैंड की
मोआकी मूर्तियां सहित दुनिया की तकरीबन 80 फीसदी विश्व प्रसिद्ध धरोहरों पर जलवायु परिवर्तन से खतरा है। आईपीसीसी के अनुसार अब यह खतरा काफी बढ़ चुका है। इसे कम करने के लिए ठोस कदम उठाने की बेहद जरूरत है।
ऐसे में 2009 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन में भारत की युग रत्न श्रीवास्तव जो लखनऊ के सेंट फिडलिस कालेज की कक्षा नौ की छात्रा थीं, की विश्व नेतृत्व को दी चेतावनी स्मरण हो आती है। उसने कहा था कि -” मैं जलवायु परिवर्तन से धरती पर आये संकट से काफी चिंतित हूं। क्योंकि मैं नहीं चाहती कि हमारी भावी पीढ़ियों को भी जलवायु परिवर्तन पर ऐसे ही ठोस और त्वरित कार्रवाई करने की जरूरत पड़े। आज हिमालय पिघल रहा है। ध्रुवीय भालू मर रहे हैं। हम अबूझ रहस्य गंवाते चले जा रहे हैं। धरती का तापमान लगातार बढ़ता ही जा रहा है और प्रशांत महासागर का पानी लगातार बढ़ रहा है। क्या हम अपनी भावी पीढ़ी को यही सब देने जा रहे हैं।” असलियत में आज 16 साल बाद देश-दुनिया की स्थिति तबसे भी और भयावह है जिसकी विकरालता को हम आज समझ नहीं पा रहे हैं।
दरअसल आज धरती का तापमान लगातार बढ़ते जाने से मानव समाज विनाश के कगार पर आ खड़ा हुआ है। यही वह अहम वजह है जिसके चलते समूची दुनिया में ग्लोबल वार्मिंग की चर्चा जोरो पर है। यह समूची दुनिया के लिए एक शोचनीय और चिंताजनक समस्या है। फिर जीवाश्म ईंधन से 57 फीसदी, क्लोरोफ्लोरोकार्बन यानी सी एफ सी से 17 फीसदी, कृषि से 14 फीसदी, जंगलों के सफाये से 9 फीसदी व दूसरे उद्योगों से 3 फीसदी से ज्यादा ग्रीनहाउस गैसें वायुमंडल में छोड़ी जा रही हैं। इससे प्रकृति का मिजाज बदल रहा है। फिर मानसून की दिशा, दशा और चरित्र भी बदल रहा है। इससे दुनियाभर में फसलें पहले तैयार होने की वजह से कृषि उपज गिर रही है। कैलीफोर्निया, ब्रिस्टल और यूट्रैक्ट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के शोध और अध्ययन कहते हैं कि किसी भी तरह के असंतुलन वैश्विक स्तर पर बदलाव लाने वाले साबित होंगे। तापमान में बढ़ोतरी का दुष्परिणाम समुद्र के पानी के लगातार तेजाबी हो जाने के रूप में सामने आया है। यदि यह सिलसिला जारी रहा तो सदी के आखिर तक पानी में रहने वाली तकरीबन 30 से 40 फीसदी तक प्रजातियां लुप्त हो जायेंगी। यदि वातावरण में ऐसे ही कार्बन डाई आक्साइड का उत्सर्जन होता रहा तो हालात और बिगड़ जायेंगे। उन हालात में नुकसान की भरपाई में लाखों-लाख साल लग जायेंगे। ऐसे हालात में धरती पर खतरा दिनोंदिन बढ़ता ही जायेगा।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।)


